lalbagh palace indore: लावारिस लालबाग: सात साल से बन रही सिर्फ योजनाएं

स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट का काम भी तीन साल में पूरा नहीं हो पाया

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इंदौर। पुरातत्व विभाग और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत यहां जीर्णोद्धार की योजना पर काम तो शुरू किया है, लेकिन तीन साल बाद भी कुछ खास नहीं हो पाया।

कभी अधिकारी कोरोना को देरी का कारण बताते हैं तो कभी फंड रिलीज होने में देरी का बहाना बनाकर लापरवाही की कहानी बनाते हैं।

पिछले 6 सालों में भी लालबाग को संवारने की कई योजना बनाकर दावे किए गए, लेकिन पैलेस की सुरक्षा दीवार ही चारों तरफ से छलनी नजर आती है।
तीन साल पहले लालबाग पैलेस परिसर के जीर्णोद्धार के लिए स्मार्ट सिटी में पहले 15 करोड़ की योजना बनाई गई थी। इसमें बाहरी सुंदरीकरण और नवीनीकरण का कार्य किया जाना था।

इसमें परिसर के अंदर का बगीचा बनाना, फव्वारे लगाना, क्षतिग्रस्त बाउंड्रीवॉल, सड़क का निर्माण, पैलेस के सामने की सड़क, पानी की लाइन, ड्रेनेज लाइन की मरम्मत करना आदि काम शामिल थे। बाद में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में धन की कमी आने से अधिकारियों ने हाथ खींच लिए। आर्थिक तंगी के कारण 15 करोड़ रुपए की योजना सिर्फ 1.60 करोड़ रुपए पर आ गई।

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इसके साथ अफसरों ने कई काम भी योजना से हटा दिए। अब तक जो काम तय हुए थे, वे भी चींटी की चाल से चल रहे हैं। बारिश में लालबाग पैलेस की टपकती छत का स्थाई समाधान नहीं निकल पाया है। पुरातत्व विभाग दुरुस्त नहीं कर पाया। केशरबाग रोड पर कई जगह से बाउंड्रीवाल टूट चुकी है, इसे भी नहीं बनाया गया। अब सभी तरफ से लालबाग लावारिस की तरह नजर आता है। प्रशासन से लेकर विभाग के अधिकारियों तक इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। लालबाग को लेकर छह साल से केवल योजनाएं बनकर रह गई और नेताओं अधिकारियों ने सिर्फ दावे किए।

लालबाग परिसर 72 एकड़ में फैला है। इसमें से 4 एकड़ जमीन पर पैलेस बनाया गया है। सात साल पहले तत्कालीन मुख्य सचिव एंटोनी डिसा और पुरातत्व विभाग के अधिकारियों ने लालबाग का दौरा कर जीर्णोद्धार की योजना बनाई थी।

सोच-विचार के बीच योजना ठंडे बस्ते में चली गई। दो-तीन साल बाद फिर इस योजना की धूल झाड़कर इस पर काम करने का मन बनाया। उस समय स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत नगर निगम ने भी परिसर के बाहरी सौंदर्यीकरण का जिम्मा लिया। करीब आठ साल पहले आईडीए अध्यक्ष रहते हुए सांसद शंकर लालवानी ने यहां उद्यान निर्माण की घोषणा की थी, लेकिन यह भी पूरी नहीं हो पाई।

लालबाग को संवारने की कहानी कितनी पुरानी

राज्य शासन के पुरातत्व विभाग की संपत्ति हो चुके इस पैलेस और बाग को संवारने की तो कई घोषणाएं और दावे किए गए, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं आया। लालबाग पैलेस कभी होलकर राजवंश के राजाओं का निवास स्थल हुआ करता था।

135 साल पुरानी धरोहर यह महल होलकर राजाओं और महारानियों से दमकता था, लेकिन अब यहां खामोशी का राज है। राजे-रजवाड़ों के वैभव का नायाब नमूना अब शासन की लापरवाही का नमूना है। 36 साल से सरकार की उदासीनता के कारण अब दुर्दशा का शिकार हो रहा है।

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1987 में राज्य शासन के पुरातत्व विभाग ने होलकरों के उषाराजे ट्रस्ट से इसे 65 लाख में खरीदा था। इसके बाद 1988 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह ने लालबाग को आम जनता के लिए लोकार्पित कर दिया। पर जनता की इस धरोहर को सजाने-संवारने की सारी योजनाएं धरी रह गईं। इतने सालों में केवल एक बार इसकी पुताई हुई है, लेकिन अंदर और बाहर कोई काम नहीं हुआ।

अंतरराष्ट्रीय धरोहर बनाने की योजना पर चल रहा काम

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लालबाग पैलेस के जीर्णोद्धार को लेकर पुरातत्व विभाग की योजना अंतरराष्ट्रीय स्तर की धरोहर बनाने की योजना थी। पैलेस के अंदर विभाग के अलावा विश्व धरोहर निधि डब्ल्यूएमएफ भी काम कर रहा है। कारपोरेट सोशल रिस्पांसबिलिटी के तहत इंडिगो एयरलाइंस ने डब्ल्यूएमएफ को करीब सवा 4 करोड़ रुपए दिए थे। रामपुर कोठी और चंपा बावड़ी का संरक्षण भी किया जाना है, जिस पर अब तक काम शुरू नहीं हो पाया है। lalbagh palace indore

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