Sulemani Chai: अल्पसंख्यक मोर्चा इंतजार में!…निगरयार के निगहबान…खजराने में कागज़ी अस्पताल…

अल्पसंख्यक मोर्चा इंतजार में!…
भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चे का हाल इन दिनों कुछ ऐसा है कि न कोई पूछने वाला है, न कोई तलाशने वाला। कभी युवा मोर्चा और महिला मोर्चा के साथ इसे भी पार्टी का एक अहम मोर्चा माना जाता था, लेकिन अब बड़े नेता इसकी तरफ देखना भी जरूरी नहीं समझ रहे हैं। प्रदेश में लगभग सभी मोर्चों की नियुक्तियां हो चुकी हैं और जिला इकाइयां भी बन रही हैं, लेकिन अल्पसंख्यक मोर्चा अब भी इंतजार की कतार में खड़ा है। अब यह सुस्ती मौजूदा पार्टी नीति का हिस्सा है या फिर पिछले प्रदेश अध्यक्ष की धीमी कार्यशैली का नतीजा, जो कोई खास छाप नहीं छोड़ पाए, इसलिए नए दावेदार भी आगे आने से बच रहे हैं। इंदौर के दोनों पूर्व अल्पसंख्यक नगर सेठों की निष्क्रियता का असर भी कम नहीं रहा। हालात यह हैं कि अब कोई इंदौरी नेता इस जिम्मेदारी को अपने सिर लेने के लिए ज्यादा उत्साहित नजर नहीं आता। कहीं ऐसा न हो कि मोर्चे की घोषणा से पहले ही दावेदारों का मोर्चा ठंडा पड़ जाए।
निगरयार के निगहबान…
इस बार कर्बला मेले की उठा-पटक में कर्बला कमेटी के नए सदर कुछ यूँ पर्दानशीं रहे, जैसे नई-नवेली दुल्हन पहली बार ससुराल आई हो। उधर जिला सदर रेहान शेख की सियासी गाड़ी का पेट्रोल भले ही खत्म हो गया हो, मगर उनकी रफ्तार कम होने का नाम नहीं ले रही। लोग कहते हैं कि उनका यह जोश शायद बीजेपी में मुस्लिम कियादत की नई जगह तलाश रहा है। बहरहाल, अंजाम अच्छा रहा तो सब अच्छा रहा। मगर पूरे किस्से में एक नंबर काज़ी साहब की सांसें जरूर ऊपर-नीचे होती रहीं। वजह भी वाजिब थी—मेला न लगता तो अवाम न आती, और अवाम न आती तो सरकारी ताजिय़े का नजराना भी हल्का पड़ जाता, जिसका रास्ता आखिर कहाँ जाता है, यह शहर खूब जानता है। बेचारे काज़ी साहब भी न घर के रहे, न घाट के। समाज की रहनुमाई भी करनी है और प्रशासन के गुस्से से भी बचना है। शायद यही वजह रही कि पूरे हंगामे में हुजूर की तरफ से चूं सुनाई नहीं दी।
खजराने में कागज़ी अस्पताल…
खजराना का 100 बिस्तरों वाला सिविल अस्पताल भी गजब है। 2018 में मंजूरी मिली, 2019 में पांच एकड़ जमीन आवंटित हुई, स्टाफ भी मंजूर हो गया, लेकिन अस्पताल साहब आज तक फाइलों से बाहर नहीं निकल पाए। सरकारी रिकॉर्ड में अस्पताल पूरी शान से खड़ा है, बस जमीन पर उसकी एक ईंट नजर नहीं आती। अफसरों का कहना है कि कब्जा मिलते ही निर्माण शुरू हो जाएगा। अब यह कब्जा कब मिलेगा, यह शायद किसी दूसरी फाइल में दर्ज है। खजराना की करीब तीन लाख की आबादी इलाज के लिए इंतजार कर रही है, लेकिन उनका अस्पताल अभी भी कागज़ों में भर्ती है। इधर दोनों पार्षद, उनके पति व प्रतिनिधि खामोश हैं और उधर सामाजिक कार्यकर्ता तबरेज मंसूरी अस्पताल की मांग को लेकर आवाज बुलंद कर रहे हैं। सवाल वही है—खजराने को आखिर कब तक मंजूरी, आवंटन और आश्वासन ही मिलते रहेंगे, और जनप्रतिनिधि जनता के हक पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते रहेंगे…?
मेहबूब कुरैशी
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