Sulemani Chai: मेजर हम्ज़ा की शहादत पर सियासी खामोशी…!

मेजर हम्ज़ा की शहादत पर सियासी खामोशी…!
इंदौर के लाल शहीद मेजर हम्ज़ा को आखिरी सलाम के वक्त सियासी गलियारों में खामोशी नजर आई। शहर कांग्रेस से इक्का दुक्का नेताओं के अलावा कोई बड़ा चेहरा दिखाई नहीं दिया।न बीजेपी के बड़े नेता, न महापौर, न विधायक-मंत्री और न ही कांग्रेस के मुस्लिम पार्षद नजर आए।इतना ही नहीं, शहर के दो नंबर काजी साहब भी इस शहीद की शहादत से दूर रहे। जो सियासतदां अक्सर देशभक्ति के सर्टिफिकेट बांटते हैं, वे शहादत के मौके पर गैरहाजिर रहे। सवाल उठना लाजिमी है कि क्या शहीद को आखिरी सलाम भी सियासी दल देखकर किया जाएगा? मेजर हम्ज़ा किसी पार्टी या मजहब के नहीं, पूरे मुल्क के बेटे थे।चुनावी मौसम में हर दरवाजे पर दस्तक देने वालों की कदमताल शहादत के वक्त आखिर क्यों थम गई? शहर अब पूछ रहा है—मेजर हम्ज़ा का कोई पुरसाने-हाल क्यों नहीं ?शहादत का मजहब नहीं होता, फिर श्रद्धांजलि में ये सियासी दूरी क्यों ?अब देखना है कि जिम्मेदार लोग इस सवाल का जवाब देंगे या खामोशी को ही जवाब बनाए रखेंगे।
ओवैसी की पार्टी…बीजेपी का काम…!
सियासत भी अजीब शै है, कब कौन किसका काम कर जाए, पता ही नहीं चलता। पिछले दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र अपने मुद्दों को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे और मुल्कभर से समर्थन मिल रहा था। तभी अचानक कॉमन सिविल कोड का शगूफा सियासी फिजा में उछाल दिया गया। इससे अलग-अलग बिरादरियों के रस्मो-रिवाज और रवायतों पर असर पड़ सकता है। मगर उस वक्त इस मुद्दे के खिलाफ मैदान में कोई खास नजर नहीं आया। तब आवैसी की इंदौर की एआईएमआईएम टीम भोपाल में बड़े प्रदर्शन के लिए पहुंच गई। सवाल ये नहीं कि विरोध क्यों किया, जब इंदौर के जंतर-मंतर पर छात्र अपने मुद्दे को लेकर आवाज उठा रहे हैं,तो भोपाल में किसी दूसरे मुद्दे का झंडा बुलंद करने की जरूरत क्यों महसूस हुई? क्योंकि सियासत में कभी-कभी विरोध का शोर भी किसी और की आवाज बुलंद कर देता है। कहीं एमआईएम का विरोध, बीजेपी की सियासत को ही तो ऑक्सीजन नहीं दे रहा ? जनाब, सियासत में दोस्ती और दुश्मनी दोनों बड़ी नाज़ुक चीजें हैं। कभी सामने वाला मुखालिफ नजर आता है, मगर फायदा किसी और का हो जाता है। अब शहर की सियासी महफिल में यही चर्चा है—काम किसका, फायदा किसका…?
प्रतापगढ़ी के जन्मदिन पर नेताओं की दूरी…
कांग्रेस के राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विभाग के अध्यक्ष इमरान प्रतापगढ़ी के जन्मदिन पर सियासी महफिल तो सजी, मगर मेहमानों की फेहरिस्त ने कई सवाल भी छोड़ दिए। प्रदेश प्रभारी आबिद कागदी अपनी टीम के साथ जन्मदिन के धूम-धड़ाके में शामिल होने पहुंच गए, तो इंदौर से भी अमीनुलसुरी ने पहुंचकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। मगर जिन जनाब की नजरें इन दिनों कांग्रेस अल्पसंख्यक विभाग में किसी अहम ओहदे पर टिकी हैं, उनमें से ज्यादातर इस मौके से दूर ही नजर आए। अब इसे इत्तेफाक कहें या फिर सियासी गणित—ये तो वही जानें, लेकिन चर्चा जरूर शुरू हो गई है। क्योंकि आने वाले दिनों में पूरे प्रदेश में कांग्रेस अल्पसंख्यक विभाग की नई नियुक्तियां होना है। ऐसे में राष्ट्रीय अध्यक्ष का जन्मदिन पद के दावेदारों के लिए तो एक अच्छा मौका माना जा सकता था। लेकिन इंदौर समेत प्रदेशभर में न बड़े-बड़े होर्डिंग नजर आए, न अखबारों में विज्ञापनों की भरमार और न ही जन्मदिन को लेकर कोई खास सियासी हलचल दिखाई दी। क्या टिकट, पद और ओहदे की उम्मीद में भी अब सियासी दूरी नापी जाने लगी है? या फिर जनाब को लगा कि जन्मदिन मनाने से पहले नियुक्तियों का रिजल्ट देख लेना ज्यादा मुफीद रहेगा…?
दुम छल्ला..
दतिया के दो जश्न…
इस समय टूटी फूटी कांग्रेस को दतिया उपचुनाव में मिली सफलता से थोड़ी ऑक्सीजन जरूर मिली है, लेकिन शहर कांग्रेस में इसमें भी दो फाड़ नजर आई। एक तरफ तो शहर अध्यक्ष चिंटू चौकसे ने दतिया का जश्न गांधी भवन पर मनाया वही दूसरी टीम ने जिसमें पिंटू जोशी, अमन बजाज और अमीनुल सूरी ने मालवा मिल पर दतिया जीत का दूसरा जश्न मनाया। पूरे मामले के निर्देशक अमीनुल खान सूरी रहे इससे कांग्रेस को फायदा या नुकसान का गणित तो बस वो ही जाने, मगर कहा जा रहा है कि पिछले दिनों प्रदेश अध्यक्ष की मौजूदगी में पिंटू और चिंटू के बीच हुए विवाद को लेकर भी यह दूरी हुई। दोनेां के बीच मारपीट की बातें भी कही गई थीं।
मेहबूब कुरैशी ९९७७८६२२९९