Sulemani Chai: जिसकी लाठी, उसकी भैंस…!गुस्से का बिल… दोनों परिवार भर रहे हैं।।

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जिसकी लाठी, उसकी भैंस…!
प्रदेश की बीजेपी सरकार ने एक बार फिर वक्फ बोर्ड की लॉलीपॉप डॉ. सनव्वर पटेल के हाथ में थमा दी। बीजेपी के पास उन्हें देने के लिए इससे आगे कुछ हे भी नहीं । वक्फ नियमों में संशोधन कर उनका कार्यकाल अगले पाँच साल के लिए बढ़ा दिया गया। हो सकता हे कि डॉ. साहब ने अपने से पहले वाले के मुकाबले बेहतर काम किया होगा, लेकिन सवाल यह है कि अगर यही मेहरबानी पहले वालों पर भी कर दी जाती, तो शायद डॉ साहब का नम्बर भी नहीं आता । इसीलिए मसला काबलियत का नहीं नियम व कायदे ताक पर रख किये फैसलों का हे । लिहाजा अब डॉ साहब मुस्लिम मसलों का इलाज भी उसी कुर्सी पर बैठे-बैठे करेंगे, जिन जिन से हिसाब किताब पूरा करना हे चाहे बैठते-बैठते छाले ही क्यों न पड़ जाएँ। अब जऱा उन दो हिंदू सदस्यों की भी बात हो जाए जिन्हें वक्फ बोर्ड में जगह मिली है। इनमें इंदौर के मालपानी जी भी शामिल हैं, जो संघ की राजनीति से जुड़े रहे हैं। कभी एक थाने में टीआई की कुर्सी पर विराजकर संविधान और व्यवस्था की खूब चर्चा बटोर चुके हैं। अब जिन पर खुद कानून की मर्यादा को लेकर सवाल उठते रहे हों, उनसे वक्फ की ज़मीनों को भू-माफियाओं से बचाने की उम्मीद करना भी कम दिलचस्प नहीं। देखना ये हे कि मालपानी अब पानी पर भी ध्यान देते हे या सिफ ,,,,,,,से ही गुजारा करेंगे सियासत में इसे ही शायद कहते हैं—बाड़ ही खेत की रखवाली करेगी।

गुस्से का बिल… दोनों परिवार भर रहे हैं।।
खजराना के चर्चित हत्याकांड में फरियादी शानू ठेकेदार की मौत ने दो परिवारों की जि़ंदगी बदल दी। एक पल के गुस्से की कीमत अब दोनों पक्ष अलग-अलग तरीके से चुका रहे हैं। चर्चा है कि आरोपी आरिफ बरकाती की कानूनी मदद के लिए दोस्तों की टीम सक्रिय हो गई है। कानूनी खर्च से लेकर दूसरी व्यवस्थाओं तक का इंतज़ाम किया जा रहा है, जबकि विरोध भी महज़ प्रतीकात्मक जुलूस तक सीमित रहा। उधर पूरे घटनाक्रम में खजराना थाना भी सवालों के घेरे में रहा और एक बड़े अधिकारी पर कार्रवाई की गाज भी गिर चुकी है। लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे अहम किरदार वह परिवार है, जिसने अपना एक सदस्य हमेशा के लिए खो दिया। अगर दोस्ती निभाने का इतना ही जज़्बा है, तो इंसाफ की लड़ाई के साथ इंसानियत का फजऱ् भी निभाइए। दोस्त की कानूनी मदद अपनी जगह, लेकिन उस घर की खामोशी का भी ख्याल होना चाहिए जहाँ अब एक कुर्सी हमेशा खाली रहेगी,,,

इंदौर से झलका दतिया का दर्द…!
दतिया उपचुनाव की आहट क्या हुई, इंदौर के राऊ में बैठे नरोत्तम मिश्रा के परम समर्थक इरफान मंसूरी का उत्साह सातवें आसमान पर पहुंच गया। साहब ने पूरी टीम-टाम तैयार कर ली, मानो चुनाव दतिया में नहीं, उनके ही वार्ड में होना हो। जोश का आलम यह था कि मतदान तो दूर, नामांकन भी पूरा नहीं हुआ था और इरफान भाई ने सोशल मीडिया पर मिश्रा जी को अग्रिम विजय की बधाई तक दे डाली। लेकिन कहते हैं, राजनीति में सबसे बड़ा खिलाड़ी हाईकमान होता है। एक फैसले ने ऐसा पानी फेरा कि सारी चुनावी तैयारी धरी की धरी रह गई। अब राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि इरफान भाई का दिल फिर से पुरानी मोहब्बत यानी कांग्रेस की तरफ मचल सकता है। वैसे भी उनके राजनीतिक सफर में पार्टी बदलना कोई नया अध्याय नहीं है—एक बार यह ट्रेलर दर्शक देख ही चुके हैं। राजनीति में मौसम और नेताओं की निष्ठा… दोनों कब बदल जाएँ, इसका पूर्वानुमान मौसम विभाग भी जारी नहीं कर सकता।

दुमछल्ला….
ज़मीन पर उतरेगा कागज़ी अस्पताल…!
करीब छह साल तक फाइलों की ऑक्सीजन पर जि़ंदा रहने वाला खजराना का 100 बेड का सरकारी अस्पताल आखिरकार अब कागज़ों से निकलकर ज़मीन पर उतरने की तैयारी में है। लगता है सरकारी फाइलों का आईसीयू अब खाली होने वाला है। खजराना की जिंदादिल अवाम ने लगातार आवाज़ उठाई, सोशल मीडिया ने शोर मचाया, न्यूज़ चैनलों ने कैमरे घुमाए और अखबारों ने सुर्खियाँ बनाईं। तब जाकर प्रशासन की नींद खुली और उसे याद आया कि अस्पताल सिर्फ नोटशीट पर नहीं, ज़मीन पर भी बनते हैं।इसलिए सबसे बड़ी मुबारकबाद किसी नेता या अफसर को नहीं, बल्कि खजराना की उस जि़द्दी अवाम को, जिसनेचलो, छोड़ो कहने के बजाय बनवाकर रहेंगे का रास्ता चुना। तो जनाब, इस बार का सुलेमानी सलाम… खजराना की जागती हुई अवाम के नाम!

मेहबूब कुरैशी
९९७८६२२९९

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