shastri bridge indore: शास्त्री ब्रिज पर फैसले की बैठक और नगर निगम से पूछा भी नहीं

सांसद मेट्रो और रेलवे ने तय कर लिया की तोड़ेंगे ब्रिज , फिर मेट्रो की बनाई डिजाइन में क्या पहले से ही ब्रिज नहीं था

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इंदौर। शास्त्री ब्रिज तोड़कर 6 लेन नया ब्रिज तैयार करने का फैसला सांसद शंकर लालवानी, रेलवे के अधिकारियों और मेट्रो रेल के अफसरों की सहमति से बाले बाले के लिया गया है। इतने बड़े फैसले पर नगर निगम राय भी नहीं ली गई और ना ही इस बैठक की जानकारी महापौर या निगम आयुक्त को दी परवारे ही फैसले कर लिए।

नए ब्रिज की योजना को लेकर मेट्रो ट्रेन के लिए स्थान को लेकर जो बात सामने आई है, उसमें बड़ा सवाल यह है कि मेट्रो ट्रेन के रूट को लेकर जब सर्वे रिपोर्ट तैयार की गई थी, तब इस ब्रिज को तोड़ने की आवश्यकता क्यों नहीं बताई गई। शास्त्री ब्रिज अचानक तो नहीं पैदा हो गया, मेट्रो की प्रोजेक्ट रिपोर्ट में क्या अनपढ़ इजीनियरों ने इसे शामिल नहीं किया था। शहर के पूर्व-पश्चिम को जोड़ने वाले शहर के 69 साल पुराने शास्त्री ब्रिज को तोड़कर उसे नया बनाया जाएगा। इसके लिए किए प्रारंभिक सर्वे के साथ सहमति भी बन गई है। ब्रिज को नया बनाने का खास कारण यहां से मेट्रो का शहर के बीच से गुजरना बताया जा रहा है।

नया ब्रिज बनने के साथ इसके ऊपर से मेट्रो ट्रेन गुजरेगी। सांसद शंकर लालवानी ने यह फैसला रेलवे और मैट्रो के अधिकारियों के साथ बैठकर ले लिया है, इस फैसले में नगर निगम को दरकिनार करने की बात भी सामने आ रही है। इस मामले में नगर निगम का दावा है कि उनके किसी अधिकारी को इस बैठक में नहीं बुलाया गया। साथ ही इतने बढ़े मामले में फैसला लेने को लेकर महापौर तक को जानकारी नहीं दी गई।

वहीं एक सवाल यह भी उठ रहा है, की मेट्रो रुट प्लान तय करने से पहले लाखों रुपए खर्च कर जो सर्वे कराया गया था, उसमें पुल तोड़ने की बात क्यों सामने नहीं आई।
हर दिन डेढ़ से दो लाख वाहनों का बोझ झेलने वाला 72 साल पुराना शास्त्री ब्रिज को तोड़कर नया बनाने पर फैसला तीन लोंगों ने बंद कमरे में ले लिया गया, इसमें सभी विभागों के समन्वय के साथ जनता के बीच फैसला लिया जाना चाहिए था।

अधिकारियों ने कागजों पर ब्रिज को नया बनाने का ब्लूप्रिंट तैयार कर लिया है, लेकिन विशेषज्ञ मानते है, कि ब्रिज को तोड़कर नया बनाना कोई आसान काम नही है। इंदौर के सीनियर कंसल्टेंट अतुल शेठ का कहना है कि अगर ब्रिज को तोड़ा गया तो कम से कम तीन दो से साल तक शहर की जनता को परेशानी भोगना पड़ेगी। उन्होंने नए ब्रिज को लेकर सामने आने वाली विसंगति को लेकर कहा कि शास्त्री ब्रिज को तोड़कर नया बनाया जाता है तो, इसकी ऊंचाई बढ़ने से पुल की दोनो तरफ की भुजाएं हाई कोर्ट तक और जिला कोर्ट तक हो जाएगी। इससे काफी दिक्कतें शहर को होगी। और निर्माण के दौरान 2 साल तक शहर को अकल्पनीय कष्ट ओर तकलीफ होगी।

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कई विकल्प मौजूद

मेट्रो को दृष्टिगत रखते हुए ब्रिज तोड़े बिना फिल्म कॉलोनी से यानी गांधी प्रतिमा से पहले, अहिल्या लाइब्रेरी के बगीचे से होते हुए शास्त्री ब्रिज के पास से शास्त्री मार्केट और इंदौर प्रीमियर को-ऑपरेटिव बैंक के मध्य से होते हुए, मेहतानी मार्केट से छोगालाल उस्ताद मार्ग होते हुए, मेट्रो सीधे खातीपूरा होते हुए कृष्णपुरा पुल पर निकल सकती है।

महापौर को दरकिनार कर लिया गया निर्णय

शास्त्री ब्रिज तोड़कर नया ब्रिज तैयार करने के फैसले पर महापौर पुष्यमित्र भार्गव की राय दरकिनार करने की बात भी सामने आई है, दरअसल इस मुद्दे पर ली गई बैठक में चर्चा के लिए महापौर को बुलाया ही नही गया, ना ही नगर निगम का कोई जिम्मेदार अधिकारी मौजूद था, और सांसद शंकर लालवानी ने बाले बाले ही यह फैसला लेकर प्रेस नोट जारी कर दिया, बताया जा रहा है कि बाले बाले लिए गए इन फैसले से महापौर पुष्यमित्र भार्गव भी सहमत नहीं है।

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