सत्तर साल से कायम ऐसी दोस्ती जो साम्प्रदायिक सौहार्द की शानदार मिसाल

विष्णुप्रसाद शुक्ला,खुरासान पठान और एमके जैन नेफकीरी से अमीरी तक नहीं छोड़ा एक दूसरे का हाथ

इंदौर। इंदौर में यूं तो दोस्ती की कई कहानियां परवान चढ़ चुकी है। कुछ ऐसी रही जो बीच राह में ही खत्म होती गई और कुछ ऐसी रही जिन्होंने दोस्ती का इतिहास रच दिया। इसी में से एक साम्प्रदायिक सौहार्द और सगे भाई से ज्यादा बेहतर रिश्तों के साथ बनी हुई है। इन तीन दोस्तों में एक दोस्त ऐसा भी जो ताकतवर दोस्तों को उनके परिवारों के सामने डांटने का माद्दा भी रखता है।

दूसरी ओर दोस्ती ऐसी की एक दोस्त के यहां आये दुख में सभी दोस्त खड़े रहे तो दूसरों के यहां चुल्हे नहीं जले, यही दोस्ती अब दूसरी पीढ़ी में भी शानदार तरीके से दिखाई दे रही है। हम बात कर रहे हैं भाजपा के वरिष्ठ नेता विष्णु प्रसाद शुक्ला और उनके अभिन्न मित्र खुरासान पठान और एमके जैन की। उम्र के ८० दशक पूरे कर रहे तीनों दोस्त आज भी उसी प्रकार से मिल रहे है जैसे अपने पुराने दिनों में। मजेदार बात यह है कि जब विष्णुप्रसाद शुक्ला ने भाजपा का झंडा उठाया उस दौरान भाजपा की शहर में कोईपहचान नहीं थी। तो एक आंदोलन में उन्हें जेल जाना पड़ा, तो उनके मित्र खुरासान ने कहा भाई तुझे अकेला तो नहीं जाने दूंगा, और इसके बाद वे भी १९ महीने साथ में जेल रहे। इस दौरान उनके अभिन्न मित्र एमके जैन दोनों परिवारों का पूरा ध्यान रखते रहे।

इंदौर शहर दोस्ती और खानपान के लिए ही जाना जाता है। हम सत्तर साल पुरानी उस दोस्ती का बखान आज इसलिए कर रहे है कि आज भी तीनों दोस्तों के बीच चुनाव के दौरान ऐसा लगता है जैसे अपने ही परिवार का बच्चा मैदान में है। तीनों ही अपने समय में गठिले बदन के साथ खूबसूरत भी थें। कड़े संघर्ष के बाद विष्णुप्रसाद शुक्ला ने अपने आप को कारोबार में खड़ा किया। उन्होंने एक बातचीत में बताया कि वे हम्माली से लेकर रनगाड़े तक चला चुके है। प्रारंभिक स्थिति में भाईयों और परिवार को पालने के लिए वे खुद ही रनगाड़े में सामान लेकर शहर में जाते थे। तब एक रनगाड़े से पूरे दिन हम्माली के बाद मात्र १० रुपए बचते थे। इसके बाद उन्होंने कुछ समय मिल में भी नौकरी की।

वहीं उन्होंने मजदूरों के दर्द को भी समझा और इसके बाद वे मजदूरों के बीच बड़े भाई के रुप में अपनी जगह बना पाए। इसके उपरांत भाजपा के वरिष्ठ नेता प्यारेलाल खंडेलवाल के आग्रह पर वे भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताबने। वहीं उनके साथ प्रकाश सोनकर की एक बड़ी टीम भी जुड़ गई। इसी के सहारे वे सांवेर जनपद के अध्यक्ष भी बने और इसके बाद स$िक्रय राजनीति में अपनी जगह बनाने में सफल हो गये। दो बार कांग्रेस के खिलाफ भाजपा से चुनाव मैदान में भी उतरे इस दौरान खुरासान पठान उनके साथ साये की तरह बने रहे। एक समय के बाद यह समूह ताकतवर समूह हो गया। पर तीनों की दोस्ती में कोई फर्क नहीं आया।

खुरासान पठान ने जब विष्णुप्रसाद शुक्ला के साथ भाजपा का झंडा उठाया उस समय मुस्लिमों के लिए यह पार्टी अछूती थी, लेकिन दोस्ती की खातिर वे उनके साथ रहे। १९७५ में जब मीसाबंदी में विष्णुप्रसाद शुक्ला की गिरफ्तारी की तो खुरासान पठान ने भी दोस्ती निभाते हुए १९ महीने साथ में जेल काटी। बड़े भैया के माता-पिता जहां खुरासान पठान को अपने बेटे की तरह मानते थे, तो वहीं खुरासान पठान के माता-पिता विष्णुप्रसाद शुक्ला को बेटे की तरह समझते थे। शुक्ला परिवार में जब एक दुखद समय आया तो खुरासान पठान और एनके जैन ने भी अपने बाल दिये। तो वही खुरासान पठान के परिवार में दुख की घड़ी आयी तो शुक्ला परिवार में चुल्हा नहीं जला।

पठान कहते है कि बड़े भैया के दरवाजे से कभी कोई खाली नहीं लौटा। वे सदैव मदद के लिए तैयार रहे और इसी में कई बार उन्हें विवाद भी झेलना पड़ा और उनके लिए दोस्ती सदैव ऊपर रही। एक मामले का जिक्र कुछ ऐसा भी आया है कि अटल बिहारी वाजपेयी के परिवार पर यहां एक संकट आने के बाद उन्होंने ही विष्णुप्रसाद शुक्ला को मदद का आग्रह किया और उन्होंने स्वयं पूरे परिवार की मदद की। पठान कहते है कि ब्राह्मण परिवारों को एक जाजम पर लाने का काम सबसे पहले उन्हींने शुरु किया था उस दौरान अलग अलग ब्राह्मण जातियों के सम्मानित लोगों को साथ में खड़ा कर परशुराम जयंती का शुभारंभ किया। इस दौरान मुझे पूरी शोभायात्रा के सम्मान और स्वागत की जवाबदारी भी उन्होंने दी थी। आज भी यह परंपरा कायम है। विष्णुप्रसाद शुक्ला के एक अन्य मित्र एनके जैन कहते है कि संजू मेरी गोद में खेला है। परिवार का सबसे विनम्र और समझने वाला बेटा है। शहर को लेकर वह मौका मिला तो अवश्य कुछ करेगा। साथ ही वह अपने कार्यकर्ताओं और मित्रों के लिए सदैव समर्पित रहेगा।

२५ दिन तक खुरासान अस्पताल के दरवाजे पर ही बैठे रहे


कुछ बातों को लेकर एमके जैन ने अपनी याददाश्त के अनुसार कुछ किस्से बयां किए जिसमे उन्होंने बताया कि एक समय सेंट्रल जीमखाने पर एक हादसे में जब शुक्ला घायल हो गये और उनकी स्थिति गंभीर हो गई तो खुरासान पठान उन्हें अस्पताल ले लगे और २५ दिन और रात तक वे अस्पताल के दरवाजे पर ही तब तक बैठे रहे जब तक की वे पूर्णत: स्वस्थ नहीं हो गये। इसी प्रकार चंदगीराम दंगल के बाद हुए दंगों के दौरान भी जब शुक्ला पठान के घर पर बैठे तो कतिपय मुस्लिम बंधु वहा पहुंचे और उन्होंने पठान के परिजनों से कहा कि शुक्ला से दूरी बनाये रखे। इसी प्रकार शुक्ला के परिवार में भी कुछ विप्रबंधु पहुंचे और उन्होंने पठान से दूरी बनाये रखने की चेतावनी दी, लेकिन साम्प्रदायिक सौहार्दता की मिसाल कायम रखते हुए उन्होंने कभी एक दूसरे का साथ नहीं छोड़ा है। इतना ही नहीं जब पठान की माताजी की तबीयत खराब हुई तो शुक्ला उन्हें एमवाय ले गये और उपचार कराया और पठान की अम्मी ने शुक्ला की गोद में दम तोड़ा। इधर जब पठान को अटैक आया तो बड़े भैया ही उन्हें दिल्ली ले गये और जब वे पूरी तरह से स्वस्थ हुए तब उन्हें इंदौर लेकर आये। हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान पूर्व केंद्रीय मंत्री शहनवाज हुसैन संजय शुक्ला को मनाने पहुंचे तब भी खुरासान पठान ने भाजपा से जुड़ी ४० साल की तपस्या को ठुकराते हुए संजय शुक्ला के पक्ष में प्रचार किया और उन्होंने शुक्ला परिवार से अपनी दोस्ती तोड़ने से इंकार कर दिया। यही वजह है कि शुक्ला और पठान परिवार की तीसरी पीढ़ी भी इस दोस्ती को बखूबी निभा रही है।

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