Sulemani Chai – गुड़ खाएं और गुलगुलें से परहेज़…खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे…

गुड़ खाएं और गुलगुलें से परहेज़…
पिछले दिनों वंदे मातरम् नहीं गाने पर जब बहस छिड़ी, तो असल मुद्दे ऐसे गायब हुए जैसे धूप में ओस। कांग्रेस पार्षद फौजिया शेख साहिबा ने बहस का रुख ऐसा मोड़ा कि मुद्दे पीछे रह गए और मामला बस बयानबाज़ी तक सिमट कर रह गया। उधर रुबीना मेडम भी अपनी ही कही बातों के बोझ तले कुछ यूं दबती नजर आईं कि पहले तेवर दिखाए, फिर बैकफुट पर आकर माफी की राह पकड़ रही है। सवाल ये नहीं कि कौन मजार पर जाता है या कौन नहीं—सवाल ये भी है कि क्या इलाके में वाकई विकास हो रहा है या सिर्फ अपनों का अस्तबल भरा जा रहा है ? जऱा ये भी बताइए कि जो भूमिपूजन में महापौर के साथ बड़े साहब आहुति दे रहे है क्या वो सही हैं? इलाके में छोटे साहब जो बन रहे मकानों से अस्तबल टैक्स वसूलते है क्या वो सही है ? कमीशन के चक्कर में ठेकेदारों की हालत ऐसी कर दी जाती हे काम घटिया होता चला जाता हे ? पार्षद बनने के पहले आपकी मिल्कियत कितनी थी ओर अब तमाम घोड़ा बग्गी मिला कर कितना मालों जर मौजूद हे दिल पर हाथ रख कर जरा इसका हिसाब लगा ले ? सियासी गलियारों में चर्चा गर्म है कि ये पूरा शोर-शराबा असल मुद्दों से ध्यान भटकाने का एक तरीका है—ताकि न सवाल उठें, न जवाब देने पड़ें। बाकी जनाब, सच क्या है और सियासत क्या—ये तो आप बेहतर जानते हैं…!

खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे…
इंदौर की सियासत में एक अजीब उसूल चलता है—बीजेपी अगर किसी अल्पसंख्यक चेहरे को आगे कर दे, तो विरोध डिफ़ॉल्ट सेटिंग में चालू हो जाता है। यहां तो हालत ये है कि अगर कोई फरिश्ता भी उतार दिया जाए, तो उसमें भी प्रैक्टिकल दिक्कतें निकाल ली जाएं। ताज़ा किस्सा जिला हज कमेटी अध्यक्ष की कुर्सी का है। पहले राशिद शेख आए—काम भी किया, मगर इल्ज़ामों का साया साथ-साथ चला। अब हाजी जुनेद की बारी आई, तो वही पुराना स्क्रिप्ट दोबारा चल पड़ी—ज़मीनी विवाद, नई एंट्री, वफादारी के सर्टिफिकेट लेकिन जनाब, असली कहानी फाइलों में नहीं, सुलेमानी चाय के अड्डों पर पक रही है। चर्चा ये है कि किसी पांच नंबर के अल्पसंख्यक नेता ने हज हाउस की खुर्शी के लिए तीन नम्बर की एक धुर से पांच लाख की फिरौती ले रखी हे अब जब कुर्सी कहीं और जा लगी, तो साहब पैसे लौटाने में आनाकानी हो रही हे ओर इल्जामों का दौर चल पड़ा है। पांच नंबरी नेता जी की तलाश तो आप भी कर सकते हैं—हमने तो बस इशारा कर दिया है।

भरोसे की ताज़पोशी…
प्रदेश की सबसे बड़ी मुस्लिम एजुकेशनल सोसाइटी, इस्लामिया करीमिया सोसायटी के चुनाव में इरफान मुल्तानी का निर्विरोध अध्यक्ष मनोनीत होना सिर्फ एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि भरोसे की दोबारा मुहर है। यह वही कमेटी है जिसने बीते कार्यकाल में काम के ज़रिए अपनी पहचान बनाई। अगर इक्का-दुक्का कमियों को नजऱअंदाज़ कर दिया जाए, तो कुल मिलाकर प्रदर्शन बेहतर नहीं बल्कि बेहतरीन की श्रेणी में रखा जा सकता है। तालीम के मैदान में जिस तरह से इस इदारे ने अपनी साख को मज़बूत किया है, वो काबिले-तारीफ़ है। अब जिम्मेदारी और बढ़ गई है—उम्मीदें भी और निगाहें भी। राय देना आसान है, मगर असली इम्तिहान तो मैदान में उतरकर काम करने का होता है, और ये कमेटी अब तक उस कसौटी पर खरी उतरी है। अब तक के काम के लिए कमेटी को सुलेमानी सलाम बनता है। दुआ है कि अल्लाह इस इदारे को और तरक़्क़ी दे, और ये तालीम की शमा यूं ही रौशन रहती रहे।
मेहबूब कुरैशी
९९७७८६२२९९

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