पहली बार भाजपा में संभागीय संगठन मंत्री के बिना चुनाव

पूरा संगठन बिखरा-बिखरा हो गया, अभी तक एक भी बड़ी बैठक नहीं

इंदौर। भाजपा में संगठन सर्वोपरि मानकर सभी नेता व कार्यकर्ता काम करते रहे है व इसकी कमान हमेशा संभागीय संगठन मंत्री के पास रहती थी लेकिन कुछ समय पूर्व ये पद ही समाप्त कर दिया गया जिसके कारण न केवल नेता बल्कि कार्यकर्ता भी मनमानी कर करते नज़र आ रहे है क्योंकि कोई भी लगाम पकड़ने वाला नहीं है। इसी कारण कई पदाधिकारी ही खुद के या परिजनों के टिकिट लेकर मैदान में आ गए है जिसके कारण संगठन बिखरा बिखरा नज़र आ रहा है। अभी तक भाजपा संगठन की एक भी बड़ी बैठक नहीं हुई है। लगभग हर वार्ड में संगठन के बिना ही उम्मीदवारों को मैदान में लड़ना पड़ रहा है।

भाजपा में कभी संगठन मंत्री का पद महत्वपूर्ण होता था इस पद पर संघ के जुड़े किसी वरिष्ठ पदाधिकारी की नियुक्ति होती थी लेकिन जैसे ही ये पद समाप्त हुआ वैसे ही भाजपा के नेता बेलगाम हो गए । ना कोई शिकायत सुनने वाला रहा ना करने वाला। संभागीय संगठन मंत्री के बिना पहली बार हो रहे चुनाव में भाजपा का संगठन बिखरा नजर आ रहा हैं। जिस पार्टी में बूथ तक टीम होने का दावा किया जाता है। उसमें पार्षद चुनाव टिकट बंटवारे के बाद टीम टूट गई हैं। पहले जहां संगठन मंत्री का खौफ कार्यकर्ता तो ठीक नेताओं तक में नजर आता था। अब न कोई तलब करने वाला बचा न ही नेताओं पर कमान कसने वाला रहा। जिनके जिम्मे टिकट बांटने की जिम्मेदारी थी। वे भी अपनो को खुश करने में संगठन को भुल गए कि जिन्हें टिकट दे रहे उनके कंधो पर पहले से पार्टी की जिम्मेदारी हैं। पिचासी में से एक दर्जन टिकट पार्टी पदाधिकारियों और उनकी पत्नी को दे दिए गए। जिसके बाद ये सभी जिम्मेदार अपने वार्ड तक के ही रह गए। दीनदयाल दफ्तर तो ठीक अपने वार्ड के बाहर क्या हो रहा है। इनके पास देखने तक की फुर्सत नहीं है। भाजपा में नगर महामंंत्री जैसे पदो को हासिल करने के लिए बड़े नेताओं में कुश्ती होती रही हैं। अपने समर्थकों को जगह दिलाने के चक्कर में नगर टीम समय पर बन भी नहीं पाई थी। बावजूद इसके दो महामंत्री को टिकट थमा दिए गए। संदीप दुबे पर तो इतनी मेहरबानी की गई कि महामंत्री के साथ ही उनकी पत्नी को टिकट भी मिल गया। सविता अखंड को भी टिकट के लिए मश्क्कत नहीं करना पड़ी। ये दोनों टिकट मिलने के बाद वार्ड में ही डटे है जबकि नगर महामंत्री का चुनाव में बड़ा रोल रहता हैं। अध्यक्ष के बाद इन्हीं के जिम्मे शहर होता हैं।

नगर उपाध्यक्ष प्रणव मंडल और मंत्री योगेश गेंदर को भी टिकट देकर वार्ड तक ही कर दिया। मंडल अध्यक्ष के पास तीन से चार वार्डो में संगठन की जिम्मेदारी होती है। यहीं पार्टी के काम बूथ तक कराने के जिम्मेदार है। जब इन्हें ही टिकट बांट दिया जाएगा तो ये खुद का वार्ड देखेंगे कि मंडल की जिम्म्मेदारी। मंडल अध्यक्ष महेश चौधरी, नीतिन कश्यप तो उमेश मंगरोला और को भी टिकट देकर एक वार्ड तक ही बांध दिया। युवा मोर्चा के नगर मंत्री रहे महेश बसवाल,मंडल अध्यक्ष राहुल जायसवाल और महिला मोर्चा की महामंत्री कंचन गिदवानी भी टिकट मिलने के बाद वार्ड में ही हैं। संगठन के इन बारह चेहरों को टिकट देकर टीम भाजपा ने जोखिम लिया है उसी का नतीजा है कि चुनाव में संगठन की कसावट कम हो गई है।

मुख्यमंत्री को कार्यकर्ताओं के हाथ में सुपारी देकर काम करने का संकल्प दिलवाना पड़ रहा हैं। टिकट बंटवारे पर हुई बगावत से संगठन चिंता में है। आठ को पार्टी से निकाल दिया है। पहले भी बगावतियों का बाहर का रास्ता दिखाया जाता रहा है , लेकिन बाद में पार्टी में ले भी लिया गया था। इसलिए इसका डर भी बागियों में नहीं हैं। जिन्हें पार्टी के बड़े नेता पहले ही बगावत के बाद बैठाने में कामयाब हुए है वे चुनाव में मुंह दिखाई कर रहे हैं। इन सबके पीछे भाजपाई पंडितों का कहना है कि संगठन मंत्री नहीं होने का खामियाजा भुगतना पड़ रहा हैं। अब कार्यकर्ता और नेताओं में डर ही नहीें रहा। पहले संठगन मंत्री के रहने से सब सूत सावल में रहते थे। इस बार तो संगठन जिनके जिम्में है उन्हीं नेे मनमानी कर डाली हैं। इनकी खबर भोपाल भी पहुंच गई है। चुनाव बाद गाज गिर सकती हैं।

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