होलकर परिवार की स्मृति में बनाई गई छत्रीबाग और कृष्णपुरा की छत्रियां बन गई इंदौर की पहचान

यादें जो.....यादगार हो गईं

 

  • अपने प्रथम प्रवास के दौरान माता अहिल्या महल में न ठहरकर छत्रीबाग स्थित मैदान में तंबू में ठहरी थीं

  • कृष्णा बाई होलकर के नाम से बनाईगई कष्णपुरा छत्री और कृष्णपुरा पुूल, इसी वजह से यहां का नम यही हो गया

 

इंदौर। ( मेहबूब कुरैशी) मध्यप्रदेश के ह्रदयस्थल इंदौर पर होलकर परिवार ने २५० सालों तक राज किया। इसके १४ शासकों ने मराठा साम्राज्य और फिर अंग्रेजी साम्राज्य के अधीन रहकर इंदौर को नई पहचान दिलाई। इस परिवार के ज्यादातर राजाओं ने इंदौर की प्रजा को भरपूर सुखदाई जीवन देने के लिए समय समय पर कई कार्य किए। आर्थिक, सामाजिक विकास के साथ शहर में कई इमारते बनवाई जो आज इंदौर की पहचान बनी हुई है। लाजवाब निर्माण शैली सुंदर कलाकारी की वजह से इन इमारतों को आज भी लोग निहारने आते है। छत्री बाग और कृष्णपुरा की छत्रिया आज भी उसी तरह लोगों को अपनी और आकर्षित कर रही है।

किसी भी इंदौरी के लिए ये गर्व की बात है कि शहर के माथे राजबाड़़ा से कुछ ही दूरी पर कृष्णपुरा की छत्रियां इंदौर शहर की शान अब भी बनी हुई है। महाराजा यशवंत राव होलकर की पत्नी कृष्णाबाई होलकर के नाम पर बनी इन छत्रियों में पांच सामाधियां है। यहां कुल तीन छत्री बनी है। इसी वजह से इस पूरे इलाके का नाम भी कृष्णपुरा इसी वजह से पड़़ा। इन छत्रिोयों पर सुंदर कलाकृति की गई है। इन छत्रियों पर की गई नक्काशी मराठा कला को इंगित करता है। $खान नदी के किनारे पर बनी ये छतरियां पत्थरों की बनी हुई है। इन पर सिपाही,देवी,देवताओं और अन्य मूर्तियां तराशी हुई है। इस स्थान पर कृष्णा बाई होलकर के लिए मंदिर भी बनाया गया था। शहर में बनी हर छतरी किसी राजा या रानी का समाधि स्थल है। नगर प्रशासन ने यहाँ विद्युत सज्जा कर रखी है जिससे रात में सभी छतरियां रोशनी से जगमगा उठती हैंै। यहाँ मूर्तियों पर फव्वारे लगे है और सुन्दर बगीचे में लोग यहाँ पर्यटन के सतह सुकून की अनुभूति भी करते हैै। स्मारक के बड़े गु्ंबद, पिरामिड सी मीनारें मानों अपने निचे दफ़न राजा या रानी की अंत्येष्टि के बाद उन्हें प्रणाम कर दुनिया को उनकी महानता की कहानी कह रही है।
१७२८ में होलकर सूबेदार मल्हार राव के हाथों में आने के बाद ही इंदौर के विकास की यात्रा शुरू होती है। इंदौर में सरस्वती और कान्ह (खान) नदी के किनारे राजाओं ने अपने परिजनों की याद में छतरियों का निर्माण करवाया। इंदौर में सबसे पहले गोमतीबाई होलकर और देवी अहिल्या बाई के पुत्र मालेराव होलकर की छतरियां बनवाई गई। ये छतरियां माता अहिल्या बाई ने बनवाई थी। १७८४ में जब पहली बार माता अहिल्या इंदौर प्रवास पर आई थी तब वह महल में न ठहरकर छत्राबाग में ही ठहरी थी। यहां पर उनके पुत्र माले राव और सास गोमती बाई होलकर की छत्रियों के बीच तंबू लगवाया गया था। छत्रीबाग $का में माता अहिल्या ने गणगौर माता का मंदिर बनवाया था। इसके साथ ही कई छतरियां भी बनवाई। यही वजह है कि इस पूरे छेत्र का नाम छत्रीबाग पड़़ गया। 26 अक्टूबर 1843 को महाराजा हरिराव होलकर के निधन के बाद इसी स्थान पर उनका अंतिम संस्कार कर छत्री का निर्माण किया गया। कहने को तो यह हरिराव होलकर की छत्री है लेकिन इस परिसर में तात्या जोग (वि_ल राव किबे), बापूराव आदि की छत्री भी बनी है। गणगौर घाट के समीप बनी इस छत्री में देवी-देवताओं की मूर्तियां तो अंकित हैं ही, साथ ही आखेट, प्रेम, शासन, गुरु, नारी श्रृंगार, महाभारत और रामायण के दृश्य, पूजन के दृश्य भी पत्थरों को तराशकर अंकित किए गए हैं। मुख्य छत्री में भगावान शिव के साथ हरिराव होलकर और उनकी पत्नी की प्रतिमाएं भी हैं जिनकी पूजा आज भी खासगी ट्रस्ट के तहत होती है लेकिन छत्री की देखभाल स्मार्ट सिटी के तहत हो रही है।

राजमाता कृष्णा बाई होलकर ने बनवाया था गोपाल मंदिर
कहा जाता है कि यशवंत राव होलकर प्रथम की पत्नी कृष्णा बाई होलकर भी बेहद धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी। दीन दुखियों की मदद में भी सबसे आगे रहती थी। लोगों को इनमें माता अहिल्या बाई की छवि दिखाई देती थी। इंदौर के राजवाड़़ा के पास ही बना गोपाल मंदिर का निर्माण भी कृष्णा बाई ने ही १८३२ में करवाया था। वह कृष्ण भागवान को अपना अराध्य मानती थी। इन्ही के काल में इस मंदिर को जन्माष्टी पर सजाने की परंपरा शुरू की गई थी।
राजवाड़़ा के समीप इस लिए बना गुरूद्वारा इमली साहिब
शुरूआत में इंदौर मेंआबादी सिर्फ जूनीइंदौर में थी। गुरूनानक देव जब इस इलाके से गुजरे तो उन्होने बस्ती के बाहर इमली के पेड़़ के नीचे अपना पड़़ाव डाला। इस दौरान बस्ती के लोगों ने उनकी खूब सेवा की। बाद में यहीं पर गुरूद्वारा इमली साहब का निर्माण किया गया। बताया जाता है कि वह इमली का पेड़़ आज मोजूद है जिसके नीचे नानक देव जी ने पड़़ाव डाला था। काफी दिनों तक यहां ठहरने के बाद नानकदेव जी यहां से प्रस्थान कर गए थे।

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