कोयला उत्पादन में विश्व में भारत दूसरे स्थान पर, बिजली उत्पादन में तीसरे स्थान पर फिर भी संकट!

ऊर्जा क्षेत्र गहरे संकट में, ऊर्जा क्रांति धड़ाम हो गई

नईदिल्ली (ब्यूरो)। भारत विश्व का सबसे बड़ा कोयला उत्पादक देशों में पहले स्थान पर है। जबकि बिजली उत्पादन में भारत विश्व में तीसरे नंबर पर बना हुआ है। इसके बाद भी सरकार की लापरवाही के चलते ऊर्जा क्षेत्र गहरे बिजली संकट में फंस गया है। सबसे बड़ा कोयला उत्पादक देश अब बिजली संकट से निपटने के लिए पहली बार राज्यों को 21 लाख टन कोयला आयात करने के लिए लाइसेंस जारी करने जा रहा है। 16 राज्यों में भारी बिजली संकट पैदा हो गया है। बिजली उत्पादक घरों में कोयला न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है। कोयले से भरी ट्रेनें तेजी से दौड़ रही हैं पर यह स्थाई हल नहीं होगा। दूसरी ओर राज्यों पर कोयला कंपनी का 90 हजार करोड़ रुपया बाकी है जो कोयला मंत्रालय की कमर तोड़ रहा है। पूरा मई माह लंबी बिजली कटौती के साथ भीषण गर्मी में और तकलीफ देगा।
भारत वर्ष पूरे विश्व में बिजली और कोयला उत्पादन में सबसे ऊपर 2010 से बना हुआ है। इसके बाद भी 2014, 2018, 2021 के बाद अब फिर 2022 में देश में सबसे बड़ा बिजली संकट फिर खड़ा हो गया है। सरकार पिछले संकट से कुछ भी सीखने की कोशिश नहीं कर रही है। इसके चलते ऊर्जा क्षेत्र गहरे संकट में फंस गया है। भारत की बिजली उत्पादन क्षमता 8.9 प्रतिशत की दर से हर साल बढ़ रही है जो जीडीपी से ज्यादा है। नेशनल इलेक्ट्रिक सिटी प्लांट के तहत भी सरकार के आंकड़े बता रहे है कि मांग 5 प्रतिशत और उत्पादन 8 प्रतिशत बढ़ रहा है। इसके अलावा 2012 से ट्रांसमिशन की लाइनें भी 7 प्रतिशत बढ़कर 3.9 लाख किमी तक पहुंच गई है। देश के 60 फीसदी बिजली उत्पादन करने वाले बिजली घर कोयले से ही चल रहे है। 2020 में कोयला मंत्रालय के चिंतन शिविर में यह निर्णय हुआ था कि 2022-23 में कोयले का आयात पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा। देश बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है। दूसरी ओर केन्द्र सरकार ने जब पूरे विश्व में कोयले की कीमतों में कच्चे तेल की तरह आग लगी हुई है इस दौरान राज्यों को अगले तीन साल के लिए 21 लाख टन कोयला आयात करने की अनुमति दे दी है। साथ ही इससे भारत की विदेशी मुद्रा भंडार पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। लगभग सभी राज्य अब बिजली संकट से निपटने के लिए सीधे कोयला आयात की अनुमति ले रहे है। देश में जिस समय कोयले की सबसे ज्यादा जरूरत थी वह घटकर 7 साल के न्यूनतम स्तर पर आ गया है। भारत का कोयला मंत्रालय अब चाहकर भी कोयले की आपूर्ति पूरी नहीं कर सकता है। दूसरी ओर देश में जब बिजली की भारी मांग हो रही है उस दौरान बिजली उत्पादन करने वाली प्रायवेट कंपनियां जिसमें अडानी भी शामिल हैं 20 से 25 रुपए यूनिट तक देश को बिजली बेच रहे है। सरकारी कंपनी को कोयला उतना ही मिल रहा है जिससे वे तात्कालीन काम कर सके।
सरकार को चाहिए
यदि सरकार भविष्य में भी कोयला और बिजली संकट से राहत देना चाहती है तो उसे कोयला खदानों को तेजी से अनुमति देकर उन्हें पूरी सहायता दे। वहीं राज्यों का कोयला मंत्रालयों पर बकाया 90 हजार करोड़ रुपए भी बॉण्ड जारी कर देने की व्यवस्था करें।
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