देश घोर बिजली संकट की ओर बढ़ा : 753 यात्री ट्रेनें रोकी कोयले की ट्रेनें दौड़ाई, केन्द्र और राज्य में तू-तू-मैं-मैं शुरू

राज्यों पर 1 लाख करोड़ से ज्यादा बिजली कंपनियों का बकाया, विदेशों से महंगा कोयला लाने को तैयार

नई दिल्ली (ब्यूरो)। देशभर के बिजली घरों में कोयले का भारी संकट पैदा होने के बाद अब केन्द्र और राज्यों के बीच इस मुसीबत का ठिकरा फोड़ने की स्पर्धा शुरू हो गई है। बिजली घरों में मात्र 2 दिन का कोयला ही शेष बचा है। अभी कोयले की आपूर्ति के लिए रेल मंत्रालय ने 753 यात्री ट्रेनें रद्द कर दी है और इनकी जगह कोयले की वैगनें दौड़ाई जा रही है। राज्यों पर बिजली घरों का पुराना 90 हजार करोड़ रुपया बकाया था और अभी 12800 करोड़ रुपये की ताजा देनदारी और हो गई है। दूसरी ओर केन्द्र ने राज्यों से कहा है कि वह विदेशों से कोयला खरीदें और अगले तीन वर्षों तक खरीदना जारी रखें। इसका मतलब बिजली संकट अब अगले तीन वर्ष के लिए बना रहेगा। एक और बात यह है कि राज्यों के पास अपने ही खर्च नहीं चल पा रहे हैं, ऐसे में वह विदेशों से नकद कोयला कैसे खरीदेंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्य हिन्दुस्तान का कोयला 1300 रुपए टन नहीं खरीद पा रहे हैं और वे विदेशों से 2100 रुपए टन खरीदेंगे। कुल मिलाकर पूरी गर्मी में अब भारी बिजली कटौती शुरू हो गई है। मई में इसके और भी बड़े असर दिखाई देंगे।

केन्द्र और राज्यों के बीच अब एक दूसरे पर बिजली संकट को लेकर आरोप लग रहे हैं। केन्द्रीय ऊर्जा मंत्री का दावा है कि कोयले की कोई कमी नहीं है। राज्य कोयला उठा नहीं रहे हैं। दूसरी ओर राज्य सरकारों का दावा है कि केन्द्र सरकार उसका जीएसटी बकाया के साथ अन्य बकाया भी नहीं दे रहा है। ऐसे में वित्तीय संकट और बढ़ गया है। इस मामले में पिछले दिनों बंगाल की मु यमंत्री ममता बेनर्जी ने दावा किया कि उनका जीएसटी बकाया केन्द्र सरकार यदि दे दे तो वे टैक्स ही हटा देंगी। देशभर में रेल मंत्रालय ने अब कोयले की आपूर्ति के लिए मालगाड़ियों की र तार बढ़ा दी है और दूसरी ओर 753 से अधिक यात्री ट्रेनें स्थगित कर दी गई है। इसी के साथ राज्यों में 6-6 घंटे का पावर कट भी शुरू हो गया है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी बिजली कटौती शुरू हो गई है।

राज्य सरकारें घोर आर्थिक संकट में
जीएसटी लागू होने के बाद राज्यों की अर्थव्यवस्था के लिए केन्द्र से बकाया राशि नहीं मिल पाने से कई राज्य कर्ज उठाकर अपना कामकाज चला रहे हैं। केन्द्र सरकार पर राज्यों का 1 लाख करोड़ से ज्यादा का बकाया बताया जा रहा है। केन्द्र ने भी राज्यों से कर्ज उठाने को स्वीकृति दी है। ऐसे में राज्यों पर कोयले की खरीदी का भार उनकी कमर और तोड़ेगा।

कोयले का पैसा कौन देगा?
कई राज्यों को केन्द्र सरकार ने विदेशों से कोयला आयात करने की स्वीकृति दी है जो भारतीय कोयले से महंगा है। इसका असर आम आदमी पर पड़ेगा। बिजली की दरें और बढ़ेंगी, महंगाई पर भी इसका असर होगा।

करना क्या था
केन्द्र सरकार विदेशों से कोयला खरीदने की अनुमति देने के बजाय राज्यों को ही कोयला उठाने के लिए वैगन उपलब्ध कराती और उन्हें ही खरीदने को कहती। इससे राज्यों को नुकसान नहीं होता।

7 लाख टन की शार्टेज
कोयले की कमी की वजह से प्लांट्स जरूरत के मुताबिक बिजली का उत्पादन नहीं कर पा रहे हैं। कोल इंडिया बिजली प्लांट्स के लिए रोजाना 16.4 लाख टन कोयले की सप्लाई कर रहा है, जबकि कोयले की मांग प्रतिदिन 22 लाख टन तक पहुंच गई है।

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