
नई दिल्ली (ब्यूरो)। ईरान और अमेरिका के बीच जहां अभी युद्ध समाप्त होने की स्थिति दिखाई नहीं दे रही है। वहीं डेढ़ महीने बाद कच्चे तेल की कीमतें अभी भी 100 डॉलर के आसपास ही बनी हुई है। इसके चलते जहां तेल कम्पनियों को भारी घाटा हो रहा है और वित्तीय संतुलन अब बिगड़ रहा है। सरकार पर कीमतें बढ़ाने को लेकर भारी दबाव बना हुआ है। सरकार केवल 4 राज्यों के चुनाव समाप्त होने का इंतजार कर रही है। मतदान के अगले दिन ही पेट्रोल और डीजल पर 5-5 रुपए कीमत बढऩा तय है।
सरकारी तेल कम्पनियों को टैक्स में रियायत के बाद भी पेट्रोल पर 18 रुपए और डीजल पर 35 रुपए लीटर का नुकसान हो रहा है। यह बढक़र अब 80 हजार करोड़ रुपए के पार पहुंच गया है। वहीं सरकार की अर्थव्यवस्था पर भी दो लाख करोड़ से ज्यादा का नुकसान हो रहा है। सरकार के बजट में अधिकतम 70 डॉलर प्रति बैरल के हिसाब से बजट की स्थिति का आंकलन किया गया है। परन्तु अब 100 डॉलर प्रति बैरल कीमत होने और रुपए में लगातार गिरावट से सरकार और तेल कम्पनियों का गणित गड़बड़ा गया है। दूसरी तरफ तेल कम्पनियों में घाटे के कारण खतरे की घंटी बज रही है। ऐसे में सरकार केवल चुनाव समाप्त होना का इंतजार कर रही है। पश्चिम बंगाल में दूसरे चरण का मतदान 29 अप्रैल को होगा। इसके तुरंत बाद सरकार कीमतें रोकने की कोताही नहीं करेगी। वर्ना तेल कम्पनियों को हो रहे घाटे के लिए कर्ज की व्यवस्था के साथ सब्सिडी का प्रावधान भी करना होगा। इससे अतिरिक्त बोझ सरकार पर आएगा। अत: सरकार पेट्रोल और डीजल पर 3 से 5 रुपए तक कीमतें बढ़ा रही है। उल्लेखनीय है कि अब कच्चे तेल कीमतें कई महीनों तक 60 डॉलर प्रति बैरल जाने की संभावना नहीं है।
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