अनुपयोगी वस्तुओं से हमारा मोह

-प्रसंगवश
भारत विविधता भरा देश है।यहां विभिन्न धर्म, सम्प्रदाय, पंथ के लोग मिलजुलकर रहते है।सभी धर्मों का कोई ना कोई प्रमुख त्यौहार भी होता है।कोई ईद मनाता है तो कोई क्रिसमस मनाता है कोई अन्य त्यौहार मनाता है।हिन्इू धर्म में तो वैसे अनेक त्यौहार हैं मगर पांच दिवसीय दीपोत्सव हिंदू धर्म का प्रमुख त्यौहार है।दीपोत्सव के पूर्व हिन्दू धर्म के लोग अपने अपने घरों की साफ सफाई में जुट जाते हैं।जाहिर सी बात है कि सफाई के साथ ही घर का पुराना सामान अटाला भी निकाला जाता है।लोग जिसे अटाला समझ कर घर से निकाल देते हैं वो अटाला कबाड़ का कारोबार करने वालों के लिए दीपावली के तोहफे से कम नहीं होता है।
दरअसल इस दौरान जैसे अन्य कारोबार खूब फलते फूलते हैं उसी तरह कबाड़ का कारोबार भी चरम पर होता है। या यूं कहें कि साल भर में दीपावली पर ही उनका सीजन होता है।दरआल कई मौकों पर ये देखने में आया है कि कई परिवारों में पुरानी वस्तुओं का मोह छूट नहीं पाता है।ये भी देखने में आता है कि घर के बुजुर्ग जनों को पुरानी चीजों से कुछ ज्यादा ही मोह होता है। घर के बुजुर्ग किसी भी पुरानी वस्तु को निकालना नहीं चाहते उन्हें ये उम्मीद रहती है कि भविष्य में ये वस्तु कभी ना कभी जरूर काम आएगी फिर भले वो वस्तु रखे रखे किसी काम लायक ही ना रह जाए। अधिकांश घरों में एक स्टोर रूम नाम की जगह जरूर मिल जाती है। कहने को तो वो स्टोर रूम होता है मगर असल में वहां अनुपयोगी चीजें या यूं कहे कबाड़ ही सुशोभित होता है।दीपावली की सफाई में अनेक ऐसी वस्तुएं हाथ लग जाती हैं जो कभी घर के बड़े बुजुर्गों ने इस उम्मीद में सहेज के रखी थी कि कभी ये काम आएंगी।इसमें मुख्य रूप से बिजली के तार हो साकेट हों,नल फिटिंग का सामान हो लोहा लंगड़ हो किताबें हो या पुराने वस्त्र ही क्यों ना हों। दीपावली पर घर की पुताई.सफाई में अन्य कूड़ा कर्कट के अलावा कई बार मोटी,मोटी पुस्तकें भी बरामद हो जाती हैं जिन्हें बच्चों ने किसी प्रप्रतियोगिता की तैयारी के लिए खरीदा था। उन सबकी भले ही नौकरी लगे वर्षों हो जाएं पर पुस्तकें सहेज कर रखी रहती हैं कि शायद किसी और के काम आ जायें। इसी तरह तमाम बिजली के बचे हुए सामान और न जाने क्या क्या सुरक्षित रखा जाता है। भले ही दुबारा इस्तेमाल के लिए रखी गई कोई भी चीज शायद उपयोग में आए मगर उम्मीद के चलते ऐसी वस्तुएं सालों साल रखी जाती रही हैं। ध्यान दीजिये तो फ्रिज के टॉप पर भी आपको छोटा.मोटा कबाड़खाना मिल जाता है।
इसके अलावा वर्षों पहले आये हुए फ्रिज तथा वाशिंग मशीन की पैकिंग के भारी भरकम गत्ते भी कबाड़खाने में सुरक्षित रखे मिल जाते हैं । पहले तो दशहरा का रावण बनाने के लिए इन्हें रख लिया जाता था पर रावण बनाने वाले अपना कॅरियर बनाकर नौकरी पर बाहर चले जाते हैं या व्यस्त हो जाते हैं और वो सामान यूंही रखा रह जाता है और ;इस तरह रावण जलने से
भी बच जाता है।
हम क्यों ये सारा कबाड़ किस मोह में इक_ा करते रहते हैं हमें यह तक नहीं पता रहता कि इनका कभी उपयोग होगा भी या नहीं। यही हमारी स्थायी प्रप्रवृत्ति है और हम कभी इस पर विचार नहीं करते। जब बड़े हौसले से और करीने से हम अपना घर बनाते हैं और उसमें भी नयी पीढ़ी बाद में नुक्स निकालती है। समय और फैशन कितनी तेजी से भाग रहा है। हमारे घरों में हिंदी अँग्रेजी तथा संस्कृत साहित्य की हजारों पुस्तकें अलमारी में बंद हैं लगभग पुस्तकालय समझ लिजिए जो हमारी पीढ़ी द्वारा ही एकत्रित की गई हैं परन्तु एक रद्दी के अतिरिक्तक्त इस ढेर का नयी पीढ़ी के लिए शायद कोई अस्तित्व नहीं है। फिर फालतू का सामान जमा करने का क्या कारण हो सकता है हो सके तो विचार कीजिए।
अभिलाष शुक्ल
वरिष्ठ पत्रकार,इन्दौर
9826611505

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