गुस्ताखी माफ़: भिया, मूंछें हों तो परिहार-सेठिया जैसी…. उषा दीदी के पीले चावल…ऐसा-वैसा जान के हमको…

भिया, मूंछें हों तो परिहार-सेठिया जैसी
सहकारिता विभाग में इन दिनों सहकारिता मंत्री के दो राम-लखन पिछले बारह सालों से डंटे हुए हैं। कई आए और कई गए, परंतु इनका बाल बांका नहीं हो पाया है, यानी सैंया ही कोतवाल तो डर काहे का… जलवा यह है कि एक अधिकारी ने तो पदोन्नति भी वापस इंदौर में ही ले ली। दोनों ही इंदौर की मलाई वाली संस्थाओं पर काबिज हैं। मलाई मार के मंत्री तक भी पहुंचा रहे हैं, यह कहना है विभाग के ही दूसरे अधिकारियों का। घनश्यामसिंह परिहार तो यहां तक कहते हैं कि मंत्री उनके पांव छूते हैं, अपने बड़े भाई की तरह मानते हैं। मानेंगे भी, वरना तमाम शिकायतों के बाद कोई टिक सकता है। दूसरे उन्हीं के खास आशीष सेठिया हैं, जो बारह साल पहले तिलहन संघ से प्रतिनियुक्ति पर इंदौर पहुंचे थे। तिलहन संघ बंद हो गया और अब वे सहकारिता विभाग के सर्वेसर्वा बने हुए हैं। दोनों का ही कहना है कि हम खुद उपायुक्त के तबादले कराने का माद्दा रखते हैं तो फिर हमारा तबादला कौन करेगा।
उषा दीदी के पीले चावल…

इधर उषा दीदी महू में चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजयसिंह को पीले चावल दे रही हैं कि वे यहां आएं और लड़ें, उधर भाजपा के ही स्थानीय नेता कह रहे हैं कि पहले दीदी तो अपना बी-फार्म महू से ले आएं, क्योंकि जिस हिसाब से नए समीकरण बन रहे हैं, उसमें इस बार महू में फिर नया उम्मीदवार मैदान में होगा। इधर महापौर पद के दो कदम पीछे चूक जाने के बाद डॉ. निशांत खरे भी इन दिनों महू के गांव-गांव में दौरा शुरू कर चुके हैं। दूसरी ओर क्षेत्र में उनके पोस्टर भी बिना उषा दीदी के लग रहे हैं। ऐसे में मजेदार बात यह है कि महू के लोगों से कोई नहीं पूछ रहा कि तुम क्या चाहते हो। भाजपा भी मानती है कि महू के लोगों में नेतृत्व करने की क्षमता नहीं है, इसीलिए हर बार बाहर से ही उम्मीदवार भये प्रकट कृपाला की तर्ज पर उतर रहे हैं।
ऐसा-वैसा जान के हमको…
