Sulemani chai – मोर्चे की सवारी…53 से फिर ताल…टिफिन बांधकर काम पर…

मोर्चे की सवारी…
शहर के मुस्लिम इलाके के एक साहब हैं, जिनके जज़्बात अक्सर रात होते-होते सोच के पैमाने से बाहर छलकने लगते हैं। साहब को हर वक्त किसी न किसी ओहदे की सवारी का इंतज़ार रहता है। बड़े ख्वाब हैं, मगर घर के पास वाली कमेटी भी हाथ नहीं लगती। इन दिनों मुंगेरीलाल के सपनों में प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी भी दिखाई दे रही है। मगर साहब की सियासी जड़ें महफूज नहीं रह पातीं, हर बार कोई अपना ही दीमक लगाकर निकल जाता है। कभी फेसबुक पर खुद को चक्रव्यूह में घिरा बताते हैं, तो कभी छवि खराब करने की साजिश का दर्द बयां करते हैं। एक पोस्ट के कमेंट में तो दावा भी हो गया कि पक्के सबूत हैं और कोई ‘मुनाफिक’ साहब की नेगेटिव फाइल भोपाल तक पहुंचा आया है। सुमेमानी की राय है कि इंदौर के तमाम अल्पसंख्यक नेताओं को साहब के कासे में ‘पद के मददगार’ सिक्के डाल देना चाहिए, शायद इस बार प्रदेश अध्यक्ष की सवारी निकल ही पड़े! नाम तो समझ ही गए होंगे।
53 से फिर ताल…
इंदौर के वार्ड क्रमांक 53 आजाद नगर से कांग्रेस नेता शेख शाकिर मसूदी ने एक बार फिर टिकट के लिए पार्टी दरबार में दस्तक दी है। साहब ने करीब 30 साल पुरानी अपनी मांग को फिर धूल झाडक़र सामने रख दिया है। इस बार लगता है जनाब पूरे मूड में चुनावी मैदान में उतरने का इरादा बना चुके हैं। हार-जीत तो बाद की बात है, पहले साहब का मैदान में उतरने का इरादा कर लेना ही बड़ी खबर है।अब आगे-आगे देखिए, चुनावी ताल किसके सुर में बजती है और लंबे समय से पार्षद रहे मौजूदा पार्षद को साहब कितने वोटों से मात देने का दावा करते हैं! वैसे साहब को इरादा करने में कुछ ज्यादा समय नहीं लग गया ?
टिफिन बांधकर काम पर…
इस बार बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चे को लेकर ज्यादा बेचैनी नजर नहीं आ रही। वजह ये कि दही की कटोरी लेकर घूमने वाले पठान साहब इस बार सुबह-सुबह टिफिन बांधकर काम पर निकल रहे हैं। पिछली बार मोर्चे की कुर्सी को लेकर खूब भागदौड़ थी। मंजूर अहमद फिर रिपीट होने की फिराक में थे, तो महफूज पठान और शेख असलम के बीच मुकाबला था। मगर साम-दाम-दंड-भेद के बाद हमारे राजा बाबू नगर सेठ बन बैठे। इस बार कोई खुलकर मैदान में नहीं उतर रहा। ये रणनीति कम और पिछली कुर्सी के कांटों का असर ज्यादा नजर आ रहा है। मंजूर अहमद और शेख असलम के कार्यकाल को देखकर शायद कोई ये ताज पहनने को तैयार नहीं। असलम अध्यक्ष रहते हुए दीनदयाल भवन से दूरी बनाए रहे। खैर, फिलहाल तूती तो डॉ. पटेल की ही बोल रही है, लिहाजा करीबी ही मोर्चे की सवारी पर बैठेगा। उधर वक्फ का कार्यकाल रेहान शेख का भी खत्म हो चुका है। सुमित बाबू ने भी फरमान सुना दिया है—जल्दी प्रदेश मोर्चा अध्यक्ष नहीं बना तो विधायक संगठन से पूछकर इंदौर में अपना ही अल्पसंख्यक मोर्चा खड़ा कर देंगे!
निगम से अब बनने लगी दूरी…
अगले साल नगर निगम चुनाव हैं और पार्षद सहित एमआईसी सदस्य अब निगम में कम ही दिखते हैं, वैसे तो पहले भी ज्यादा नजर नहंी आते थे। कुल 85 पार्षदों में से लगभग आधे पार्षद ऐसे हैं जिन्हें उनके वार्ड की जनता भी शायद ही पहचानती हो क्योंकि आरक्षण, परिवारवाद और राजनीतिक पकड़ के चलते वे पार्षद बन गये लेकिन वार्ड में सक्रिय नहीं हैं। अब अगले चुनाव को लेकर तैयारियां चालू हो गई और वर्तमान पार्षद के साथ अन्य नेता भी अपने वार्ड में सक्रिय हो गये हैं। शाम के समय निगम के अधिकांश अधिकारी भी कार्यालय में नहीं बैठते हैं। एक तरह से निगम चलाने वाले गायब रहते हैं और जनता परेशान घूमती रहती है।
मेहबूब कुरैशी ९९७७८६२२९९

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