Sulemani Chai – बीजेपी का बुर्का…तबेले का तबला…

बीजेपी का बुर्का…
इंदौर में महिला आरक्षण के नाम पर बीजेपी का कार्यक्रम हुआ, लेकिन चर्चा हक़-हकूक़ की कम और बुर्के की ज़्यादा रही। पहले तो ये तय करने में ही आधी ताक़त खर्च हो गई कि बुर्का मंच पर रहे या न रहे। कुछ बोले—रहे, तो सियासी संदेश जाएगा और कुछ ने ठंडी सांस लेकर कहा—रहने दो, वोट तो मिलते नहीं आखऱिकार फैसला वो हुआ जो अक्सर होता है। बुर्के वालों की नहीं चली, और सियासत ने फिर अपना रंग दिखा दिया। दिलचस्प मंजर ये रहा कि बीजेपी के मुस्लिम चेहरे किनारे खड़े बस इशारों के मुंतजिऱ रहे। सुमित बाबू की तरफ़ निगाहें टिकी रहीं—कि शायद कोई हुक्म आए, कोई लाइन मिले। अगर बाबू इशारा कर देते, तो यक़ीन मानिए कुछ लोग तो वफ़ादारी में खुद बुर्का ओढक़र हाजिऱी लगा देते।
लिबास बदल के आए हैं सियासत के बाज़ार में,
मक़सद वही पुराना है, बस अंदाज़ नया है।
तबेले का तबला…
रुबीना मैडम के बिगड़े बोल ने ऐसा गुल खिलाया कि नगर निगम से लेकर बीजेपी खेमे तक सबने कमर कस ली कि इस बार मेडम को घर बिठाना है। इसी बीच खजराना से तबरेज मंसूरी की शिकायत क्या सामने आई, तबेले को बजाने पूरी बीजेपी की तानसेन मंडली तबरेज को मनाने में जुट गई ओर सारे ऑफर भी दे डाले मगर तबरेज़ ने भी कह दिया हमारी दुश्मनी में किसी ओर का कंधा नहीं इस्तेमाल होगा,, और तबेले का तबला बजाने का आनंद वे अकेले ही लेंगे। वही दूसरी तरफ तबेले के सभी घोड़ा बग्गी सलीम पठान की सोशल मीडिया की पोस्ट से इतने परेशान हो रहे हे कि उनकी दुकान की शिकायतें कर नोटिस पहुंचा रहे है। खैर,,अब देखने वाली बात ये है कि ये खुद्दारी का सुर आगे कितनों को बेसुरा करता है क्योंकि सियासत में अक्सर सच नहीं, संगत ही काम आती है—और तबरेज ने यहां संगत ठुकरा दी है।
हमने दुश्मनी भी की तो अदब से की है,
वरना लोग तो मोहब्बत में भी सौदे करते हैं।
नैकी कर फेसबुक पर डाल…
कभी बुज़ुर्ग फरमाते थे कि नैकी कर दरया मे डाल, यानी वो नेकी अल्लाह के सिवा किसी को न मिले। हज का मुबारक़ महीना शुरू हों गया है हाजियो का जत्था मक्का रवाना हों चला है नमाज़, जक़ात, के साथ हज भी इस्लाम का बहुत एहम फ़रिज़ा है पर कुछ हाजी इसे एक इवेंट जैसा मना रहे है। इसे दुनियावी शोहरत पाने का जरिया समझ रहे है। अपने पहचान वालो को बुलवाते है या हज पार्टी रखते है उसमे कैमरे, वीडियो वाले बुलवाते है और हर आदमी से हार पहन सोशल मीडिया पर डालते है तो कुछ वहां पहुंचते ही अपने कैमरे का बटन आफ करना ही भूल जाते हैं। हमारी दुवा हे अल्लाह इनका हज कुबूल फरमाए लेकिन इस सब में जो नदामत, आजिज़ी, इंतसारी लेकर उस मुकद्दस सफर पर पहुंचना था वो बहुत पीछे रह जाती है।
मेहबूब कुरैशी
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