Sulemani Chai: क़ाजिय़ों के इस्तीफ़े…पाँच साल के फिरौन…

क़ाजिय़ों के इस्तीफ़े…
पिछले दिनों शहर की सालों पुरानी सीआरपी लाइन मस्जिद की बाउंड्री और एक हिस्सा प्रशासनिक आदेश पर आनन-फानन में तोड़ दिया गया। शहर में इस पर अफ़सोस भी हुआ और बातें भी। कमेटी और बोर्ड की खुशफहमी का नतीजा अपनी जगह, मगर हैरानी की बात यह रही कि शहर के दोनों क़ाज़ी इस पूरे मामले में दुम दबाकर बैठे थे ,जब मस्जिद पर प्रशासन का पंजा पड़ा, तब दोनों में से कोई भी मौके पर दिखाई नहीं दिया। जबकि नंबर दो क़ाज़ी साहब तो अक्सर वहां लप्पे सूतने और तकरीर करने पहुंच ही जाते थे। एक नंबरी साहब सरकारी टीचर की तनख्वाह और डायमंड गार्डन में वक्फ अलल ओलाद का खूंटा गड़ाए बैठे हैं, तो दूसरे अपने स्कूल की वजह से कम्बल ओढ़े बैठे हैं।अब मिल्लत में सवाल उठ रहा है कि जब जिम्मेदारी के वक्त खामोशी ही ओढऩी है, तो क्यों ना दोनों हजऱत को अपने ओहदों से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए…? क्योंकि जनाब, कुर्सी इज़्ज़त तो देती है। मगर इम्तिहान के वक्त खामोशी, अक्सर सवाल भी खड़े कर देती है।
पाँच साल के फिरौन…
साहब, इन दिनों वार्ड 73 का एक धमकीभरा ऑडियो वायरल हो रहा है। जनाब एक छोटे से पार्षद पति, पर अपनी बेगम की पार्षदी की ऐसी सवारी आई के साहब खुद को फिरौन समझ बैठे। साहब इलाके के शाहीद गोरी उर्फ बाबू भाई लाला को फरमा रहे हैं कि मैं अपने दुश्मनों को पाँच साल तक परेशान करता हूँ, किसी का मकान तुड़वा देता हूँ, किसी का धंधा बैठा देता हूँ। अब साहब, ये खुदाई दावे कहीं ऊपर वाले को नागवार गुजर गए तो लेने के देने पड़ जाएँगे। इतिहास में कई फिरौन आए और रेत में दफन हो गए। वैसे भी पार्षदी कोई सल्तनत नहीं ये तो नाली, गटर और सफाई की जिम्मेदारी है। मगर कुछ लोग पाँच साल की कुर्सी पाते ही खुद को तख़्त-ओ-ताज का मालिक समझ बैठते हैं। नाम हमने जानबूझकर नहीं लिखा। रमजान का महीना है, एक के सत्तर पड़ते हैं। बस वार्ड बता दिया है—समझदार को इशारा काफी। ओर गर फिर भी समझ न पड़े तो इंदौर इंदौर वार्ड 73 गूगल कर लेना।

 चंदे का महीना…
माहे रमज़ान इबादतों और रहमतों का महीना है, मगर कुछ जगह इसे बाकायदा चंदे का महीना बना दिया गया है। जुमे की नमाज़ भी कभी-कभी चंदे के चक्कर में लेट हो रही हे, ऐसा लगता हे कि जैसे आज चंदे का आखऱिी दिन है। सवाल यह है कि क्या अल्लाह के घर के लिए बंदों के सामने इस तरह हाथ फैलाना सही हे ? अगर चंदा थोड़ा कम हो जाए तो क्या मस्जिद की रौशनी कम कर देने या सादा तबर्रुक बांट देने पर कोई फरिश्ता चालान काटने आ जाएगा? हमारी कुछ मस्जिदों में ऐसे खर्च भी होते हैं जो फिजूलखर्ची की हद छूते हैं। वही शहर में कुछ मस्जिदें ऐसी भी है जहां मस्जिद के खर्च के अलावा खैर के काम भी हो रहे हे ,जिसमें बेवा का राशन, गरीब का इलाज या किसी मुस्तहिक बच्चे की तालीम का बंदोबस्त किया जा रहा है । आज मस्जिदों को सजाने से ज्यादा जरूरत उम्मत को संभालने और संवारने की है। हमें जो सही लगा हमने बता दिया, बाकी आप समझो क्या सही है।

दुमछल्ला…. कमाल का खजराना…
शहर में खजराने की बात ही निराली है,ओर यहाँ के लोग इससे भी निराले यहां के लोग अगर यहां सबसे निराले की बात की जाये तो फेहरिस्त में पहला नाम बड़े खान का आता है। हर बार कुछ अनोखा करने वाले बड़े खान इस बार खुद की और दूसरे रोजेदारों की थकान दूर करने रोजे बाद एक मुख्तसर किस्सा लेकर हाजिर हो रहे हैं, जो कि मजेदार लगता है, तो साहब अल्लाह उनकी सलाहियतों को ओर बढ़ाए इसी के साथ इस बार सुलेमानी सलाम बड़े खान के नाम।
– मेहबूब कुरैशी 9९९७७८६२२९९977862299

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