देश को विचार धाराओं में नहीं विकास धाराओं में बांधिये…

देश कल अपनी आजादी के ७७ वर्ष पूरे कर ७८ वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। देश के सामने जहां कई चुनौतियां अभी भी खड़ी है तो दूसरी ओर यहां भी तय है कि देश राष्ट्रीयता की भावना के आधार पर आने वाली पीढिय़ों के लिए तैयार नही हो पाएगा। भविष्य की योजनाओं पर जब आज आधार बनेगा तभी कल युवाओं को बेहतर अवसर मिल सकेंगे। आज देश दो बड़ी समस्याओं के साथ खड़ा है। इसमें पहले नंबर पर बेरोजगारी दूसरे नंबर लगातार बनी हुई मंहगांई। देश भक्ति का केवल झंडा फहरा कर राष्ट्रगान करना नहीं है, बल्कि यह एक जिम्मेदारी है, अपने देश के लिए निभानी है। ७८ साल से देश में कई उपलब्धियां मिली है। अब नई उपलब्धियों के लिए हमें सयुंक्त प्रयास करने होगे। न कि अन्य को अनदेखा करके। आज का दिन उन तमाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और महान नेताओं को याद करने का दिन है जिन्होने अपने संघर्षो से इस देश को आजादी दिलाई। आज बोलने की स्वतंत्रता जो मिली है वह उन्ही संघर्षो के कारण मिली है। आजादी की लड़ाई हो या फिर देश के विकास की लड़ाई एक जूट होकर लड़ी जाती है। महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, सरदार वल्लभ भाई पटेल, भले ही एक दूसरे की विचार धारा से कतई सहमत न रहे हो परंतु देश के लिए सब एक जाजम पर आकर खड़े हुए। क्या आज तमाम नेता भले ही विचार धारा अलग-अलग हो देश के लिए एक जाजम पर खड़े हो पा रहे है, हमें अपनी सामाजिक समरसता की ओर बढऩे और समाज मे समानता की भावना को मजबूत करने के लिए सभी समाजों का सम्मान कर एक साथ एक जाजम पर लाना होगा। न कि कुछ समाजों को लगातार अलग थलग करने के प्रयास होते रहे। हमें अपने आप से यह सवाल जरूर करना चाहिए कि क्या हम ऐसी ही आजादी चाहते है… हमें देश को एक बार फिर संकीर्ण विचारधारा से बाहर लाकर नए सिरे से नई विचारधारा के साथ खड़ा करना है। जिसमें इस देश के विकास में सभी समाजों को इस बात का गर्व हो कि हम इस देश के नागरिक है। यहां देश हमारा है और इसके विकास का दायित्व भी हमारा है… तो आइए नई इबारत लिखें… स्वतंत्रता दिवस पर सभी पाठकों को बधाईयां…

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