कुत्तों से निपटना महापौर के लिए सबसे बड़ी चुनौती

जिम्मेदार नजर आ रहे लाचार, वजह हर वार्ड में है भरमार

(आशीष साकल्ले)

इंदौर। लगभग दो साल के इंंतजार के बाद आखिरकार नगर निगम परिषद बनाम शहर सरकार का गठन हो गया। महापौर, नेता प्रतिपक्ष सहित सभी पार्षद शपथ ग्रहण कर अपना दायित्व संभाल चुके हैं। इस नई परिषद से शहर के आम आदमी को काफी उम्मीदें हैं। वजह यह कि कुछ ऐसी समस्याएं हैं, जो दिन प्रतिदिन विकराल रूप लेते जा रही हैं किन्तु उनका निराकरण नहीं हो पा रहा है। फिलहाल शहर सरकार और नवनिर्वाचित महापौर पुष्यमित्र भार्गव के सामने सबसे बड़ी चुनौती कुत्तों से निपटना है। हालात कितने संगीन हैं, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिम्मेदार खुद ही हैें लाचार, क्योंकि हर वार्ड में है इनकी अच्छी-खासी भरमार…

उल्लेखनीय है कि महानगर इंदौर में पिछले ढाई-तीन दशक से शहरवासी इस गंभीर समस्या का सामना करने के लिए मजबूर हैं। जब कभी कोई हादसा होता है या दुर्घटना होती है तो अधिकारी और अन्य जन प्रतिनिधि समस्या का जल्द निराकरण करने का आश्वासन देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं और फिर बाद सारा मामला ठंडे बस्ते के हवाले हो जाता है।

पिछले पच्चीस-तीस साल में जितने भी महापौर आए, निगम प्रशासक नियुक्त हुए, सभी ने समस्या की गंभीरता को समझा भी लेकिन समस्या जस की तस है। इसका खामियाजा आम आदमी और वाहन चालकों को भुगतना पड़ रहा है। इसी के चलते, अब जबकि सात साल बाद नई शहर सरकार ने कामकाज शुरू कर दिया है और गैर राजनीतिक चेहरे के रूप में भारी मतों से निर्वाचित महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने कार्यभार संभाल लिया है, तो शहरवासियों को उम्मीद है कि अब उन्हें कुत्तों के आतंक से मुक्ति मिल जाएगी। हालाकि, यह देखना अवश्य ही दिलचस्प होगा कि महापौर इस चुनौती से कैसे निपटते हैं।

नसबंदी अभियान भी हो गया विफल

पिछले पांच साल से नगर निगम ने आवारा कुत्तों की नसबंदी के लिए दो एनजीओ वेट सोसायटी फार एनीमल वेलफेयर अर्बन और रेबिक्स इंफारमेशन सोसायटी के साथ मिलकर अभियान छेड़ा है। इसके लिए छावनी एवं ट्रेचिंग ग्राउंड में बनाए गए केन्द्र में लाकर आवारा श्वानों की नसबंदी करने का संकल्प लिया गया था। इतना ही नहीं, इसके लिए लक्ष्य भी निर्धारित किया गया था, कि रोजाना १०० श्वानों की नसबंदी की जाएगी। बावजूद इसके, निगम अपने लक्ष्य के आसपास भी नहीं फटक पाया। हालात यह है कि शहर में १०० के मुकाबले रोजाना महज ३०-३५ कुत्तों की ही नसबंदी हो रही है। महत्वपूर्ण तथ्य यह है, कि वह भी रोजाना नहीं हो रही।हालात यह है कि शहर में जितने श्वानों की रोजाना नसबंदी होती है, उससे दस गुना कुत्ते के पिल्ले रोजाना ही जन्म लेते हैं। इस तरह देखा जाए तो लाखों-करोड़ों खर्च करने के बाद भी निगम का नसबंदी अभियान पूरी तरह से विफल हो गया।

आए दिन हो रहे हादसे, शिकार हो रहे
लोग पहुंच रहे लाल अस्पताल

शहर में लगभग दो से ढाई लाख कुत्ते हैं और ५ साल से चल रहे नसबंदी अभियान के बावजूद अभी तक ४० फीसदी कुत्तों की भी नसबंदी नहीं हुई है। इधर, गली-चौराहे, मौहल्लों और कालोनियों की हर गली में कुत्तों के झुंड नजर आ रहे है। किसी को भी देखकर ये कब भड़क जाएं, कहा नहीं जा सकता। इनके भौंकने और लपकने से शहर में रोजाना ही कई दो पहिया वाहन चालक दुर्घटनाओं का शिकार हो रहे हैं तो दूसरी ओर इनके काटने की वजह से अस्पतालों में रेबिज का इंजेक्शन लगवाने के लिए लोगों की कतारें लग रही है। जो सक्षम हैं, वे बाजार से रैबिज का इंजेक्शन खरीद कर निजी अस्पतालों से इलाज करवा रहे हैं और जो गरीब या मध्यवर्गीय व्यक्ति हैवहलाल अस्पताल के चक्कर लगाता नजर आता है। हालात यह है कि रोजाना ही ढाई-तीन सौ लोग आवारा कुत्तों के काटने या उनकी वजह से हुई दुर्घटना में अपने हाथ-पैर तुड़वा रहे हैं। दूसरी ओर, जिम्मेदार इस मामले में लाचार नजर आ रहे हैं। अब देखना यह है कि नए महापौर और उनकी परिषद कुत्तों से किस तरह निपटते हैं।

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