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वहीं दूसरी ओर चुनाव हारे विधायक संजय शुक्ला थे। शुक्ला को ना संगठन का सहारा था ना सरकार का, ना किसी अन्य मजबूत आधार के साथ मैदान में थे। उन्होंने अपना ही जनाधार मजबूत करने में पूरी ताकत लगाई क्योंकि शहर में कांग्रेस का न तो संगठन था और न ही शहर में कांग्रेस का कोई मजबूत नेता जो नेता है वे खुद की पहचान के साथ जनाधारहीन होकर शहर में कांग्रेस के वोटों के भरोंसे ही रोटी लंबे समय से खा रहे है। इसी कारण 85 वार्डों में संजय शुक्ला को पूरा संगठन ही खड़ा करना पड़ गया। दूसरी और बड़े नेताओं के पट्ठा वाद ने ऐसे उम्मीदवार थोपदिए जिनका वार्डों में ही जनाधार दूर की बात पहचान तक का संकट था।Recover your password.
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