संगठन के सहारे संजय की नैया कैसे लगेगी पार

85 वार्डो में अभी तक न प्रभारी नियुक्त करे न ही कोई संगठनात्मक तैयारी

इंदौर।

शहर में 20 वर्षो से वनवास काट रही कांग्रेस के लिये इस बार उमीदो से भरी सुबह है। पर कांग्रेस संगठन अपने ही घर मे अंधेरा किये बैठी है। जिस तेजी के साथ इंदौर नगर निगम चुनाव में कांग्रेस के महापौर प्रत्याशी संजय शुक्ला ने बढ़त बनाई थी। अब उसे इस बढ़त को बनाये रखने के लिये कांग्रेस के संगठन से सहयोग मिलता नही दिख रहा है। 85 वार्डों में चुनाव के 8 दिन पहले तक भी न प्रभारी नियुक्त हुए है और न ही संगठन की कोई तैयारी दिखाई दे रही है। संजय शुक्ला स्वयं ही अपनी टीम के सहारे क्षेत्रों में कांग्रेसियों को एक जाजम पर लाने के लिए मेहनत कर रहे है। दूसरी ओर कांग्रेस के बड़े नेता जिन्हें वार्ड में कांग्रेस में जान फूंकना है वे दिनभर कार्यालयों के उद्घाटन के बाद आराम फरमा रहे है।

कांग्रेस के लिये यह छोटे चुनाव आने वाले 2023 के विधानसभा चुनाव की तस्वीर को साफ करने वाले होंगे इसमें ही पार्टी का लिटमस टेस्ट होना है, शहर की जनता भाजपा के पीछेल 20 वर्षो के शासन को पुन: चुनती है या इस बार नगर निगम की चाबी कांग्रेस को सौपेगी यह तो 17 जुलाई के परिणाम ही बताएंगे। परन्तु बीच भवर में फंसी संजय शुक्ला की नैया कांग्रेस संगठन के माध्यम से पार होती नही दिख रही। एक और जहाँ कांग्रेस की शहर कार्यकारिणी अभी तक नही बनी तो वही इस महत्वपूर्ण चुनाव में कांग्रेस के ब्लॉक और मंडलम अध्यक्षो से जमनी रणनीति तय करने को लेकर कोई बैठक नही हुई वही जो 9 प्रवक्ता बनाये थे वह भी बिना किसी दायित्व के भृमण कर रहे है।

आई टी सेल की भी भूमिका कही नज़र नही आ रही है तो कई वार्डो में टिकट ने मिलने से कांग्रेस प्रत्याशियों के सामने उनकी ही पार्टी के नेता बागी उमीदवार के रूप में खेल बिगाड़ रहे है। जब कि वार्ड स्तर पर डैमेज कंट्रोल और समन्वय बिठाने के लिये शहर अध्यक्ष विनय बाकलीवाल ने 85 वार्डो में प्रभारी नियुक्त किये जाने की घोषणा करी थी जो सिर्फ घोषणा ही बनकर रह गयी। संगठन की इन्ही कमजोरी और बिखराव के चलते महापौर प्रत्याशी संजय शुक्ला ने हर विधानसभा पर प्रभारी नियुक्त करने के साथ हर वार्ड में अपना प्रतिनधि नियुक्त कर दिया है जो पल पल की खबर महापौर कार्यालय तक पहुचा रहे है। जिसको देखते चुनावी रणनीति को तय किया जा रहा है। जिसकी वजह से उनका चुनाव अभी तक संभला हुआ है।
दोनों ही पार्टियों के लिये प्रतिष्ठा का चुनाव बन चुके इस चुनाव में एक बात तो स्पष्ट हो गयी कि भाजपा अपने मजबूत संगठन सोशल इंजीनियरिंग के साथ मैदान में उतरी है तो कांग्रेस जनता और अपने प्रत्याशियों के भरोसे। बहरहाल संजय शुक्ला की लोकप्रियता के चलते उनके वार्ड प्रत्याशियों की नैया इस भवर से पार होती जरूर दिख रही है।

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