भाजपा के कद्दावर नेताओं का सियासी अस्तित्व खतरे में

परिवारवाद के साथ उम्र का फार्मूला लागू होने से युवा चेहरों को मिलेगा मौका

इंदौर। भाजपा ने आगामी नगरीय निकाय एवं विधानसभा चुनावों को लेकर रणनीति बनानी शुरू कर दी है, जिसके चलते परिवारवाद के साथ ही उम्र का फार्मूला लागू किया जा रहा है। इससे जहां भाजपा के कद्दावर नेताओं का सियासी अस्तित्व खतरे में पड़ गया है, वहीं नए चेहरों को टिकट मिलने की संभावनाएं बढ गई है। इधर, भाजपा इस बार का चुनाव युध्दस्तर पर लड़ने जा रही है और उसका पूरा फोकस मप्र विधानसभा की उन ४८ सीटों पर है, जहां से कांग्रेस लगातार जीतते आ रही है।
दरअसल, अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा ने अपनी रणनीति तय कर ली है। इसके साथ ही एसे युवाओं की खोज भी शुरू कर दी है, जो वोट जुटाने के साथ ही प्रचंड बहुमत से जीतने का माद्दा रखते हैंं। इधर, पार्टी में उम्र का बंधन, परिवारवाद और भाई-भतीजावाद को बढावा नहीं देने की नीति के चलते अनेक खानदानी एवं कद्दावर नेताओं को अपना सियासी केरियर खत्म होने का अंदेशा पैदा हो गया है। इससे उन लोगों में आशा की नई किरण जरूर पैदा हो गई है, जो पहले चुनाव लड़ने की उम्मीदें छोड़ चुके थे।
                                                 युवा एवं निष्ठावान चेहरों की तलाश शुरू…
बताया जाता है कि शीर्ष नेतृत्व के निर्देशों को ध्यान में रखते हुए मध्यप्रदेश में भाजपा अगले विधानसभा चुनाव को लेकर पुख्ता रणनीति तैयार करने में जुटी हुई है। पार्टी में ऐसे युवा एवं निष्ठावान चेहरों की तलाश की जा रही है, जिनका क्षेत्रीय कार्य प्रभाव बेहतर रहा है। इसके लिए पार्टी में दिन रात काम चल रहा है और सर्वे के तौर पर इसकी गहराई से जमीनी पड़ताल की जा रही है। देखा जाए तो पार्टी में ऐसे अनेक कार्यकर्ता हैं जो पिछलेकई सालों से अपने कार्यों का हवाला देते हुए टिकट की मांग करते रहे हैं। इस बार भी यह कार्यकर्ता पूरी ताकत लगाने के साथ इस प्रयास में हैं कि उन्हें चुनाव मैदान में उतरने का मौका मिले।

                                 कम अंतर से जीतने वाले विधायकों व मंत्री भी हैं रडार पर…
पिछले विधानसभा चुनाव में जो विधायक एवं मंत्री कम वोटों से जीते हैं, पार्टी उनके कार्योंऔर प्रभाव की भी समीक्षा कर रही है। जमीनी स्तर पर यह पता किया जा रहा है कि यदि अगले विधानसभा चुनाव में यहां से मौजूदा जनप्रतिनिधियों को टिकट दिया जाता है तो भविष्य में क्या परिणाम हो सकते हैं। लगभग दो दर्जन ऐसे विधायक हैं, जो बहुत ही कम अंतर से विजयी हुए थे। ऐसी सीटों पर मौजूदा विधायक को ही फिर से टिकट दिया जाए या फिर इन सीटों से किसी नए चेहरे को उतारा जाए, इसके लिए भी मैदानी स्तर पर पड़ताल की जा रही है।
                                        ४८ सीटों पर है भाजपा की विशेष नजर
भारतीय जनता पार्टी की नजर उन ४८ सीटों पर विशेष रूप से टिकी हुई है, जहां पर कांग्रेस लगातार जीतते आ रही है। पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में किसी भी हालत में यह सीटें कांग्रेस से छीनना चाहती है। इन सीटों की वजह से ही पिछली बार भाजपा के हाथ से सत्ता फिसल गई थी और कमलनाथ को सीएम बनने का मौका मिल गया था। हालाकि बाद में राजनीतिक घटनाक्रम के चलते पुन: भाजपा सत्ता में आ गई, लेकिन अब वह किसी भी किस्म का जोखिम नहीं उठाना चाहती है।
                               कई पूर्व सांसद और विधायक हैं टिकट की दौड़ में
यहां पर यह भी प्रासंगिक है कि अगले विधानसभा चुनाव में टिकट पाने के लिए लगभग चार दर्जन पूर्व सांसद, मंत्री और विधायक हैं, जो स्वयं या फिर अपने परिजनों को टिकट दिलाने के लिए एड़ी चौटी का जोर लगा रहे हैं। पहले तो यह स्वयं के लिए टिकट के लिए प्रयासरत हैं, लेकिन यदि इस पर सहमति नहीं बनती है तो फिर यह अपने परिजनों के लिए भी टिकट की मांग कर सकते हैं। राजनीति के जानकारों का कहना है कि ऐसे नेताओं ने अभी से राज्य से लेकर केन्द्र स्तर तक पार्टी नेतृत्व से संपर्क साधना भी शुरू कर दिया है।
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