चार लाख पौधों से संवारा जाएगा साढ़े सात नदियों को

भगवान परशुराम की जन्मस्थली जानापाव का लौटेगा पुराना वैभव

(आशीष साकल्ले)
इंदौर। मालवा की धरा का अपना अलग ही महत्व है। यही वजह है कि अबके बरस बरसात में यहां से निकलने वाली साढ़े सात नदियों को चार लाख पौधों से संवारा जाएगा। इसके साथ ही, भगवान परशुराम की जन्म स्थली जानापाव का पुराना वैभव एक बार फिर लौटेगा। इसके लिए न केवल योजना तैयार हो गई है, बल्कि आगामी जून माह में इसका क्रियान्वयन भी शुरू हो जाएगा।

उल्लेखनीय है कि महानगर के समीप स्थित जानापाव की पहाड़ियों का न केवल ऐतिहासिक एवं पुरातत्वीय महत्व है, बल्कि यह सनातन संस्कृति से संबध्द धार्मिक आस्था का केन्द्र बिंदु भी है। कहा जाता है कि यहां पर ही ऋषि जमदग्रि के पुत्र के रुप में भगवान परशुराम का जन्म हुआ था। इतना ही नहीं, यह पहाड़ी साढे सात नदियों के उद्गम स्थल के रूप में भी चर्चित है। इसी के चलते, वन विभाग अबके बरस बरसात में चार लाख पौधों का रोपण कर जहां साढे सात नदियों को संवारने जा रहा है, वहीं परशुराम जी की जन्मस्थली का पुराना वैभव लौटाने की कोशिशों में भी जुट गया है।

पंचवर्षीय कार्य योजना के तहत किया जाएगा काम…
सूत्रों के अनुसार, महानगर के समीप मालवा की धरा पर साढे सात नदियों को संवारे जाने के प्रोजेक्ट का काम पंचवर्षीय कार्य योजना के तहत किया जाएगा। इसके तहत यहां से निकलने वाली सभी साढे सात नदियों के किनारे से अतिक्रमण हटाने के साथ ही, अवैध वन कटाई पर अंकुश लगाने, नदियों के ५०० मीटर के दायरे में चार लाख पौधों का रोपण करने ,चेकडेम एवं कंटूर निर्माण सहित विभिन्न विकास कार्यों को अंजाम दिया जाएगा। बताया जाता है, कि इसके लिए नवंबर २०२१ में तत्कालीन एसडीओ राकेश लहरी ने यह प्रोजेक्ट बनाकर इंदौर वन मंडल को सौंपा था। वहां से इसे वन मुख्यालय भेजा गया और इसे स्वीकृति भी मिल गई है। इसके चलते, अबके बरस बरसात में इस प्रोजेक्ट पर काम भी शुरू हो जाएगा।
क्योंकहाजाता है जानापाव की पहाड़ी को साढे सात नदियों का उद्गम स्थल…
देखा जाए तो जानापाव की पहाड़ी से वैसे तो आठ नदियां निकलती हैं। ये नदियां हैं, चंबल, कारम, चोरल, धामनी, नखेरी, गंभीर, अजनार और उम्रा-सुम्रा। चूंकि उम्रा-सुम्रा का दायरा काफी कम है और यह आगे जाकर गंभीर नदी में ही समाहित हो जाती है, इसलिए इसे आधी नदी कहा जाता है। यही वजह है कि जानापाव की पहाड़ी को साढे सात नदियों का उद् गम स्थल माना गया है। कार्ययोजना के पहले चरण में इन नदियों को संरक्षित किए जाने की योजना है। इन नदियों का जल स्तर बढाने के लिए बारिश में पहाड़ी से निकलने वाले पानी को नदियों तक पहुंचाया जाएगा। इसके अतिरिक्त, पानी को रोकने के लिए पहाड़ी पर चेकडेम बनाए जाएंगे एवं नदी किनारे कंटूर का निर्माण भी किया जाएगा। साथ ही इन नदियों से मिलने वाले नालों को भी व्यवस्थित तरीके से जोड़ा जाएगा।
भगवान भोलेनाथ का होता है
यहां पर जलाभिषेक….
यहां पर यह भी प्रासंगिक है कि जानापाव की पहाड़ी पर ही भगवान परशुराम का जन्म हुआ था और यहां पर भगवान भोलेनाथ का प्राचीन मंदिर भी है। इस शिव मंदिर से ही चंबल नदी का उद् गम हुआ है। नदी के पानी से शिवजी का अभिषेक स्वत: होता है। हालाकि यहां बारिश के मौसम में ही यह नजारा दिखाई देता है और गर्मी में यहां पानी नहीं बहता है। लगभग २० हजार किलोमीटर के दायरे में प्रवाहित होने वाली चंबल नदी का प्राचीन नाम चर्मण्वती है और शिप्रा,सिंध, काली सिंध और कुनू नदियां इसकी सहायक नदियां हैं। चंबल नदी मध्यप्रदेश मेंमालवा के पठार सेधार, उज्जैन, रतलाम, मंदसौर, भिंड, मुरैना आदि जिलों से होकर राजस्थान के कोटा-धोलपुर होते हुए बाद में उत्तरप्रदेश की यमुना नदी में समाहित हो जाती है।
१० हजार हेक्टेयर के विस्तृत वन क्षेत्र में फैली हैं यह साढ़े सात नदियां
महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जानापाव की पहाड़ी से निकलने वाली चंबल, गंभीर, अजनार, नखेरी, कारम, चोरल, धामनी और उम्रा-सुम्रा नदियां लगभग १० हजार हेक्टेयर विस्तृत वन क्षेत्र में फैली हैं। इन नदियों के किनारे चार लाख पौधों का रोपण किया जाएगा और यह काम स्कूली बच्चों, सामाजिक संस्थानों, स्वयं सेवी संगठनों तथा ग्रामीणों की मदद से किया जाएगा। यहां पौधों का रोपण करने के साथ ही सीड बाल भी डाली जाएंगी। इसके अतिरिक्त, नदी से लगे गांवों में लघु वनोपज को भी बढावा दिया जाएगा, ताकि आसपास के गांवों के रहवासियों की आय में वृद्धि हो और वे वन कटाई न करें।

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