2024 में मोदी के सामने होगी सबसे बड़ी चुनौती ‘आप पार्टी’

– वीरेन्द्र वर्मा
पांच राज्यों के चुनाव नतीजों ने देश का राजनीतिक परिदृश्य बदल दिया है। जीत से उत्साहित भाजपा भले ही 2024 लोकसभा को आसान मान रही है। मगर , यह नहीं भूलना चाहिए कि मात्र 10 वर्षों से राजनीति में सक्रिय एक छोटा राजनीतिक दल अपने पैर धीरे – धीरे पसार रहा है और वह आम आदमी पार्टी है। आप पार्टी के प्रमुख है अरविंद केजरीवाल जो शने: शने: देश के अलग-अलग राज्यों में पार्टी से जनता को जादुई तरीके से जोड़ रहे हैं। इस पार्टी का जादू ऐसा चल रहा है कि वर्षों से जमे राजनीतिक दलों का वजूद ही नज़र नहीं आता है। कोई भी राजनीतिक विश्लेषक और मीडिया नवीस उनको गंभीरता से नहीं लेता है। पंजाब में आप पार्टी ने जिस तरह से झाडू ( आप पार्टी का चुनाव चिन्ह ) लगाई है , उससे ऐसा लगता है कि आने वाले 2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी के सामने केजरीवाल संभवत: चुनौती पेश कर सकते है।
लोकसभा 2024 के लिए अभी समय है , मगर भाजपा यूपी चुनाव को इसी से जोड़कर चल रही थी। वहां उसे करीब 50 सीटों के नुकसान पर सत्ता हासिल हो गई। योगी निर्विवाद रूप से दौबारा मुख्यमंत्री बनेंगे , इसमें शक की कोई गुंजाइश नज़र नहीं आ रही है। भाजपा की रणनीति में यूपी चुनाव अहम था , क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में उसे योगी के चलते ही 80 में से 76 सीट मिली थी। अब यह 76 कमोबेश उसी तरह कायम राह पाएगी , इसमें फिलहाल संशय है। हां मगर यूपी में भाजपा को लोकसभा चुनाव में अखिलेश की समाजवादी पार्टी से ही मुकाबला करना है। अखिलेश , ममता बनर्जी के साथ मिलकर मोदी के खिलाफ विपक्ष बना सकते है , मगर उसके पहले 2023 में कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव भी होने है , जिसमे गुजरात , कर्नाटक, मध्यप्रदेश , राजस्थान , छत्तीसगढ़ जैसे राज्य भी है। इनमें से तीन राज्यों में कांग्रेस ने भाजपा से सत्ता छीन ली थी और गुजरात में सत्ता के करीब पहुंच गई थी मगर सरकार नहीं बनी। इस बीच भाजपा ने मध्यप्रदेश में खरीद फरोख्त करके सत्ता में वापसी कर ली। यह अलग बात है कि कांग्रेस लोकसभा चुनाव में तीनों राज्यों में 2- 3 सीट ही बचा सकी, मात्र 9 माह में भाजपा ने पूरी की पूरी सीटें जीत ली।
इस वजह से भाजपा के सामने कांग्रेस को चुनौती मानना फिलहाल तो दिख नहीं रहा है । कांग्रेस में यूं भी आंतरिक बिखराव इतना ज्यादा हो चुका है कि राहुल – प्रियंका गांधी ही सर्वमान्य नहीं रहे है। यह बात अलग है कि देश में मोदी को हमेशा राहुल गांधी ने ही ललकारा है, लेकिन वे संघ के झूठ और हिंदुत्व के मुद्दे से जनता का ध्यान महंगाई और बेरोजगारी जैसे गंभीर मुद्दे पर नहीं ला पाएं । कांग्रेस की असफलता गांधी परिवार के माथे मढ़ती गई। अब प्रियंका गांधी भी यूपी चुनाव के बाद पार्टी को संभालने वाली नेता फिलहाल तो नहीं मानी जा सकती है। इसलिए भाजपा के नरेंद्र मोदी को सबसे बड़ी चुनौती केजरीवाल से मिलने की राजनीतिक संभावना बढ़ती नज़र आ रही है।हालांकि यह आसान भी नहीं है , लेकिन दिल्ली से सटे राज्यों में अब केजरीवाल की आप पार्टी ही भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती नज़र आ रही है। इसकी बड़ी वजह है कि केजरीवाल ने दिल्ली से सटे राज्य हरियाणा में पूर्व आयएएस डॉ अशोक खेमका को प्रदेश की कमान सौंपने की तैयारी कर ली है।
यदि आप पार्टी की झाड़ू हरियाणा में चल गई तो देश का राजनीतिक परिदृश्य बदलते देर नहीं लगेगी। आप पार्टी की कार्यशैली का उदाहरण भाजपा के कई नेता देने लगे है। चर्चा यह भी है कि केजरीवाल की उत्पत्ति संघ के माध्यम से हुई है। वह कांग्रेस शासन में लोकपाल बिल के अन्नाहजारे के आंदोलन से उभरे है तो वाजिब भी लगती है यह बात। केजरीवाल की एक विशेषता यह है कि वे बड़बोलेपन को नहीं अपनाते है। दूसरा यह कि वे आप आदमी के बीच ही पार्टी के नाम के अनुरूप काम करते है , जिसमें डॉ अम्बेडकर के सिद्धांत अनुसार आखरी आदमी को उसका अधिकार दिलाने की लड़ाई लड़ना शामिल है। यही कारण है कि पंजाब में मोबाइल सुधारने और चाय बनाने वाले जैसे गरीब व्यक्ति को विधानसभा चुनाव के न सिर्फ टिकट दिए , बल्कि विधायक बनाकर आम आदमी के लिए लड़ने वाले नेता तैयार कर रहे है।
केजरीवाल की एक बात गौर करने वाली यह है कि वे किसी तरह के दबाव में नहीं आते है। इसका उदाहरण दिल्ली के विधानसभा चुनाव में उनको थप्पड़ मारने या उनके चेहरे स्याही डालने जैसे कृत्य भाजपा और अन्य राजनीतिक दलों ने किए , किंतु उन्होंने संयम से एकतरफा जीत हासिल की। दिल्ली में उन्होंने शिक्षा , मोहल्ला क्लीनिक , पानी जैसी मूलभूत आवश्यकताओं पर विशेष ध्यान दिया है , लेकिन उनके राष्ट्रीय राजनीति में अलग अलग राज्यों के मुद्दे और उनका हल खोजने की क्षमता कितनी है ? यह बड़ा सवाल है।
भले ही पांच राज्यों के चुनाव में भाजपा ने जीत हासिल कर ली हो , लेकिन पंजाब में केजरीवाल की पार्टी ने स्थापित राजनीतिक दलों को ऐसे चुनाव हराया है कि जीत के बाद भी भाजपा और अन्य राजनीतिक दल आत्ममंथन को मजबूर है।
पंजाब एक तो देश का सीमावर्ती प्रदेश है। दूसरा यह कि वह की मूल समस्या युवाओं में नशाखोरी की आदत है। पाकिस्तान सीमा से लगा होने से नशे की अवैध तस्करी आसानी से की जा सकती है। उससे केजरीवाल के बगवंत मान कैसे निजात दिला पाएंगे , यह अभी भविष्य के गर्त में छुपा हुआ सवाल है। देश की सियासत में तेजी से बदलाव का श्रेय अगर किसी को जाता है तो वह है केजरीवाल, लोग पसंद करें या नहीं करें, ईर्ष्या करें या प्यार मगर किसी भी हालत में उन्हें इगनोर नहीं कर सकते । फ़िलहाल वही है जो घटाटोप अंधेरे में मशाल उठाए है। यही कारण है कि नरेन्द्र मोदी के सामने अरविंद केजरीवाल की चर्चा होने लगी है।
केजरीवाल भी आतंरिक तौर पर मोदी को चुनौती देने की तैयारियों में जुटे हुए है। हालांकि वे इस मामले में 2023 के बाद ही मुखर होंगे , ऐसा लगता है। राजनीति में अब कारण जो भी बने , लेकिन यह तय है कि आने वाले समय में भाजपा के मोदी योगी को केजरीवाल चुनौती देंगे।
संर्पक-9425902340

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