इस गणतंत्र दिवस पर हमें साहस कर वे सवाल खुद से पूछने होंगे

वि श्व में लोकतंत्र का सबसे बड़ा ग्रंथ लिखने वाले भारत देश में आज अपने भारतीय गणतंत्र के गौरवशाली सात दशक पूरे हो रहे हैं। आज एक ऐसी विचारधारा का उभार अपने चरम पर है जो इन सात दशकों की असफलताओं और गलतियों के कालखंड के रूप में मूल्यांकित कर रही है और वह यह भी मान रही है कि इस देश की गणतंत्र की आधारशिला हमारा संविधान ही हमारी कथित समस्याओं हेतु उत्तरदायी है। आज जब हमारा गणतंत्र 73 वर्ष की आयु पूर्ण कर रहा है, तो देश की एक बड़ी आबादी सीएए, एनआरसी और एनपीआर के विरोध में खड़ी हो रही है। हालांकि उच्चतम न्यायालय ने इस पर रोक लगाने से इंकार किया है। हमारे संविधान में प्राचीन भारत में हुए अनूठे संवैधानिक विकास का कोई उल्लेख नहीं है। देश के स्वतंत्रता आंदोलन को साम्राज्यवाद के विरुद्ध वैचारिक युद्ध के रूप में भी समझा जा सकता है। देश ने साम्राज्यवादी शक्तियों की असमानता और विभाजन की बुनियाद पर अपनी सत्ता को चिर स्थाई बनाने की रणनीति को अच्छी तरह देखा और समझा था, और यही कारण था कि जब देश का संविधान बना तो इसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक समानता को मुख्य केन्द्र बनाया गया। साथ ही उदार प्रजातांत्रिक मुल्यों की स्थापना इसका लक्ष्य था। इस गणतंत्र दिवस पर हमें साहस कर यह सवाल पूछना होगा क्या 80 प्रतिशत बहुसंख्यक समुदाय के लोग शत-प्रतिशत भारतीयों का पर्याय हो सकते हैं। क्या 20 प्रतिशत अल्पसंख्यक भारतीयों का विलय 80 प्रतिशत बहुसंख्यक लोगों के साथ किया जा सकता है? इस तरह की सोच हमारे संविधान, इसके लोकतांत्रिक स्वरूप और उसमें निहित समानता के सिद्धांत और अधिकारों के साथ कोई खिलवाड़ तो नहीं है। हमारे देश की सामाजिक संस्कृति की रक्षा करना ही हमारा कर्त्तव्य है। यदि लोकतंत्र को बहुसंख्यक वर्ग की राजनीति के रूप में परिवर्तित करना चाहती है तो उसे रोकना भी हमारा कर्त्तव्य होगा।

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