लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या के बाद लिया राजनैतिक फैसला…

अं तत: आज सुबह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश के दौरान तीनों नए कृषि कानून वापस लेने का ऐलान किया। उन्होंने इस दौरान इस कानून को लेकर कई सफाई भी अपनी ओर से देने के प्रयास में कोई कमी बाकी नहीं रखी, परन्तु यह फैसला इस देश के प्रजातंत्र के सम्मान को नहीं दर्शाता है। यह फैसला अहंकार और राजनीतिक लाभ लेने वाला ही दिखाई दे रहा है। 800 से ज्यादा किसानों ने इस कृषि कानून के विरोध में दिल्ली के बाहर कड़ाके ठंड और भरी बारिश के बीच अपने प्राणों की आहुति दी, परन्तु प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार दिल्ली की सीमाओं पर कीले गाढ़कर कटीलें तारों की बाढ़ लगाकर किसानों को डराने के लिए सारे हथकंडे अपनाती रही। यहां तक कि अश्रु गैस के गोले भी बरसते रहे। इस कृषि कानून के आंदोलन से निपटने के लिए इस देश को अरबों रुपए का नुकसान उठाना पड़ा। देश की अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर दिखाई दिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा इस देश में तीन बड़े फैसले लिए गए और तीनों को सही सिद्ध करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी गई। सबसे पहले नोटबंदी की गई और दावा किया गया कि कालाधन और आतंकवाद की कमर टूट जाएगी। पूरे देश को लाईनों में खड़ा कर दिया। सैकड़ों लोगों को अपने पैसों के लिए घंटों लाईनों में ही खड़े होकर मौत से हाथ मिलाना पड़ा। पर बैंकों में अपने ही पैसे नहीं बदलवा पाए, इधर एक रुपया भी कालेधन के रूप में भारत नहीं आया, परन्तु सरकार ने इस मामले में अपने आपको सही ठहराने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। इसके बाद कोरोना महामारी से निपटने को लेकर पूरे देशभर में अचानक बिना किसी तैयारी के लॉकडाउन लगाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाहाकार मचा दिया। हजारों लोग सड़कों पर ही अपने घर पर जाने के लिए रास्ते में मरते रहे, परन्तु सरकार केवल अपनी वाहवाही में लगी रही। मरने वालों पर एक शब्द भी संवेदना का नहीं कहा। अब यह भी समझते हैं कि यह फैसला लोकतांत्रिक न होकर राजनैतिक क्यों है? उत्तर प्रदेश चुनाव में भाजपा के सर्वे ही यह बता रहे हैं कि इस बार यहां नाराजगी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से है और इसके कारणों में भयानक महंगाई, बेरोजगारी तो शामिल है ही, साथ में कृषि कानून ने भी किसानों को एक जाजम पर खड़ा कर दिया। यदि उत्तर प्रदेश चुनाव नहीं होते तो शायद अभी 100 के लगभग और किसानों की मौत पर भी निर्णय नहीं बदलता। जो निर्णय पहले दिन गलत होता है, वह 100 दिन बाद भी गलत ही रहता है। सरकार ने इस कृषि कानून को बचाने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। किसान आंदोलन के बाद यह केन्द्र सरकार पर एक करारा तमाचा भी है। अब देखना होगा कि क्या किसानों को लखीमपुरखीरी में रोंदने वाले बेटे के पिता केन्द्रीय मंत्री अजय मिश्रा ‘टेनीÓ को भी क्या प्रधानमंत्री बर्खास्त करेंगे और इसके बाद ही सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि किसान आंदोलन को लेकर जहां विपक्ष इसे चुनाव में अपना सबसे बड़ा हथियार मान रहा था, अब उसे नई रणनीति बनानी होगी। दूसरी ओर क्या किसान भी सरकार के इस फैसले के बाद सरकार की वाहवाही करते दिखाई देंगे या वे 800 किसानों की मौत को भी इस दौरान याद रखेंगे?

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