12000 करोड़ रुपए जनता के पैसों की होली…
मेट्रो क्यों असफल, गलत मार्ग पर निर्माण, कमर्शियल एरिये तक पहुंच नहीं

इंदौर (राजीव श्रीवास्तव) ९४२५०-५८३३८
ये मजाक नहीं है… वास्तव में मेट्रो शहर व ट्रैफिक दोनों की सेहत के लिए हानिकारक है। ये सपनों का शहर इंदौर सपनों का शहर में मेट्रो रेल का सपना जितना खूबसूरत था, उतना ही अनुपयोगी और जल्दबाजी का साबित हुआ है। मेट्रो निर्माण का फैसला भोपाल से हुआ राजनैतिक फैसला है बगैर प्रापर फिजिबिलिटी स्टडी कराए मेट्रो परियोजना में 12 हजार करोड़ रुपए फूंक देना जनता के पैसों की होली जलाने के जैसा काम हो रहा है। जरूरत थी मेट्रो के निर्माण के फैसले पर पुनर्विचार की जरूरत थी प्रापर फिजिबिलिटी टेस्ट की.जरूरत थी मास्टर प्लान के प्रस्तावित मुख्य मार्गों के निर्माण की जरूरत थी प्रस्तावित फ्लायओवर्स की निर्माण की.चौराहों के विकास की मिसिंग रोड लिंक्स के निर्माण कीसडक़ों के चौड़ीकरण की और सुनियोजित ट्रैफिक मैनेजमेंट लागू करने की। जरूरत थी बीआरटीएस की रिंग को पूरा करने की। उसके बाद ही मेट्रो रेल पर विचार करना उचित होता,लेकिन बिलकुल हुआ उल्टा। indore metro failure
दोष दरअसल इन्दौर के तथाकथित मजबूत राजनैतिक नेतृत्व जागरूक जनता का है। जो वर्षों से चल रहे मेट्रो के मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखते रहे और किसी ने विरोध नहीं किया। बेलगाम बढ़ती जनसंख्या वाहनों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि, प्रदूषण सडक़ दुर्घटनाओं के अनियंत्रित आंकड़े. हर चौराहे पर लगते जाम ट्रकों की रेलमपेल, पूरे शहर में अव्यवस्थित बेतरतीब पार्किंग व बस स्टैण्डस की कमी चीख-चीख कर कह रहे हैं कि ट्रैफिक सिस्टम ध्वस्त हो चुका है। मास्टर प्लान में प्रस्तावित मुख्य मार्गों का निर्माण, ट्रांसपोर्ट हब, बस स्थानकों, फ्लाय ओवर्स और सब-वे के निर्माण पर विचार न कर सीधे मेट्रो रेल का निर्माण न तो ट्रैफिक मैनेजमेंट है और न ही ट्रैफिक समस्याओं का हल।

मेट्रो के मूल सिद्धांत
– मेट्रो रेल का फायनेंशियल प्रिंसिपल है कि मेट्रो स्टेशनों की आसपास कमर्शियल एरिया डेव्हलप किया जाए, जिससे प्राप्त होने वाली राशि से मेट्रो सिस्टम की फंडिंग हो, लेकिन अभी इंदौर में इतनी कमर्शियल डिमांड नहीं है।
-मेट्रो के लिए उसके रास्ते में इतनी दूरियां होनी अनिवार्य हैं कि जहां यात्रियों को मेट्रो रेल की आवश्यकता पड़े।
-मेट्रो के लिए नगर की आबादी का घनत्व इतनी होना चाहिए कि मेट्रो के हिसाब से रेल यात्री मिल सके।
-मेट्रो का मूल प्रिंसिपल है कि यात्रियों का समय और पैसा दोनो बचना चाहिए, लेकिन इंदौर में न तो समय बचेगा और ना ही पैसा।
मेट्रो के मुख्य नुकसान
बहुत अधिक निर्माण लागत ,350 से 400 करोड़ प्रति किलोमीटर, संचालन में लगातार भारी घाटा भारत के कई शहरों में मेट्रो परियोजनाएं टिकट आय से पूरा खर्च नहीं निकाल पाती, इसमें बिजली, स्टाफ, रखरखाव और सुरक्षा पर भारी खर्च होती है। जैसे लखनऊ मेट्रो, नागपुर मेट्रो और कोच्चि मेट्रो में ।निर्माण के दौरान भारी ट्रैफिक समस्याकई सालों तक सडक़ें प्रभावित रहती हैं। व्यापार खासा प्रभावित होता है। धूल, शोर और जाम लगते हैं।

भूमिअधिग्रहण और विस्थापन
स्टेशन, डिपो और कारिडोर के लिए भूमि चाहिए होती है। कई बार दुकान व मकान हटाने पड़ते हैं।
बिजली पर अत्यधिक निर्भरता
लगातार उच्च बिजली खपत बिजली बाधित होने पर सेवा प्रभावित। शहर की सुंदरता खराबएलिवेटेड मेट्रो में बड़े पिलर छाया, सडक़े सकरी और दृश्यता कम होना ।
लचीलापन नहीं
बस रूट तो आसानी से बदले जा सकते हैं, लेकिन मेट्रो लाइन स्थायी होती है। इसे हटाया नहीं जा सकता। शहर की विकास की दिशा बदलने पर समस्या आती है।
मेट्रो क्यों असफल
गलत मार्ग पर निर्माण – जहां आबादी नहीं है वहां मेट्रो की जरूरत फिलहाल नहीं थी। कमर्शियल एरिया की डिमांड नहीं – मेट्रो का खर्च उसके कमर्शियल एरिया से निकलता है। यूरोप के बड़े शहरों में मेट्रो स्टेशनों पर बड़े-बड़े कमर्शियल एरिया होते हैं, लेकिन छोटे शहरों जैसे इन्दौर, भोपाल में अभी कमर्शियल एरिया की उतनी डिमांड नहीं है। इन्दौर में दूरिया भी इतनी नहीं है कि मेट्रो की जरूरत पड़े। भोपाल में तो जितनी देर में मेट्रो में से एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन पहुंचते हैं उतनी ही देर में एक साइकिल यात्रा वह दूरी तय कर लेता है।
ट्राम की लोकप्रियता के कारण…
-ट्राम की लागत 90 से 150 करोड़ रु. प्रति किलोमीटर है।
-यूरोप की सडक़ों पर चलने वाली रेल व्यवस्था को आमतौर पर ट्राम कहा जाता है। कुछ देशों में इसे स्ट्रीट कार या लाइट रेल भी कहते हैं। यह ट्रेन जैसी होती है, लेकिन शहर की सडक़ों पर कारों के साथ चलती है।
-यूरोप में प्रमुख शहरों जैसे एम्स्टर्डम, वियना, प्राग, ज्यूरिक, नीस, पेरिस, बर्लिन, जिनेवा, मिलान, बार्सिलोना आदि में स्थानीय परिवहन का मुख्य साधन ट्राम है।
लागत कम, सडक़ों पर ही ट्रैक बिछाना, मिनिमम भूमि अधिग्रहण, ’ हल्की ट्रेनें, स्टेशन की साधारण डिजाइन , इलेक्ट्रिक ट्राम सिस्टम, कम प्रदूषण, सडक़ पर कम जगह, मेट्रो से सस्ती, शहरों की सुंदरता बढाती, ट्रैफिक कम
मेट्रो व ट्राम का मिश्रण है उपयोगी मॉडल
मेट्रो का खर्च बर्थडे पार्टी, किटी पार्टी से नहीं निकलेगा भले ही हम उसमे विवाह समारोह स्थल या क्लब / बार बना दे तो भी उससे मिलने वाली राशि नगण्य है । मेट्रो का निवेश तो हो चूका है कुछ क्षेत्र में यह बन भी गई है े इसलिए मेट्रो की सफलता, शहर के विकास, ट्राफिक समस्या और सीमित आर्थिक संसाधनों को ध्यान में रखते हुए हमे इसका समाधान खोजना होगा….. और समाधान एक ही है मेट्रो व ट्राम का मिश्रण
लम्बी दूरी के लिए मेट्रो
कम दूरी व पुराने शहर के लिए ट्राम उपयोगी साबित होगीयूरोपीय शहर प्राग, विएना व वुडापेस्ट इसके सर्वोत्तम उदहारण है
पहले हम बात करते है ट्राम की
ट्राम अपनी कम लागत, छोटे स्टेशन, मध्यम गति, निर्माण के लिए कम समय लगने व कम बिजली खपत के कारण इंदौर व भोपाल जैसे मध्यम शहरो के लिए अत्यंत उपयुक्त है े इंदौर में मेट्रो की तुलना में ट्राम बहुत उपयोगी है
ट्राम के लिए उपयुक्त स्थल
1. ए.बी. रोड, 2. एम.जी. रोड, 3. राजबाड़ा 4. यशवंत निवास रोड 5. शहर से एयरपोर्ट जाने का मार्ग 6. केट रोड 7. राजेंद्र नगर क्षेत्र इत्यादि
अब बात करते है मेट्रो की
ट्राम कई क्षेत्रों में उपयोगी है लेकिन यह भी सही है कि इंदौर में केवल ट्राम पर्याप्त नहीं है। मेट्रो का वास्तविक मूल्यांकन केवल महंगी है या यात्रियों की संख्या कम है से नहीं होता है। भविष्य में ट्रैफिक नियंत्रण के लिए यह जरुरी है । इसे भविष्य के शहरी विकास, ट्रैफिक, भूमि मूल्य पर्यावरण व आबादी के सन्दर्भ में भी देखना होगा। मेट्रो केवल परिवहन नहीं है, इससे सिटी ब्रांडिग भी होती है। शहर की इन्वेस्टमेंट इमेज बनती है, रियल इस्टेट बढ़ता है। यह सही है कि मेट्रो परियोजना शुरुआती वर्षों में लाभ नहीं देती है इसीलिए इसे सार्वजनिक अवसंरचना निवेश माना जाता है इसीलिए मेट्रो भी चाहिए क्योंकि जनसंख्या लगातार बढ़ रही है, विजय नगर, सुपर कॉरिडोर व आई.टी. क्षेत्र तेजी से डेवलप हो रहा है , भविष्य में भारी यात्री संख्या की सम्भावना है
भविष्य में मेट्रो के लिए उपयुक्त स्थल
1.सुपर कॉरिडोर 2. रिंग रोड 3. इंदौर-पीथमपुर 4. इंदौर-सांवेर -उज्जैन 5. इंदौर-देवास
इंदौर बनाम दिल्ली मेट्रो

-अगर हम दिल्ली, हैदराबाद और अहमदाबाद में मेट्रो परियोजना का बारीकी से विश्लेषण करें तो यह ज्ञात होता है कि यह शहर लगभग 1 करोड़ की आबादी को पार कर चुके हैं।
-1996 में जब दिल्ली मेट्रो का प्रस्ताव किया गया था उस समय दिल्ली की जनसंख्या 10 मिलियन थी। इसकी तुलना में इंदौर में जब मेट्रो प्रारंभ किया जा रहा है यहां की जनसंख्या लगभग 2 मिलियन है।
-दिल्ली मेट्रो की परिकल्पना 1961 में हुई और उसे आकार लेने में 50 साल लग गए। वहां पर सडक़ यातायात के सारे साधनों और विकल्पों का पूर्ण रूप से दोहन कर लिया गया है। इन उपायों के बाद भी यातायात समस्या हल न होने के उपरांत ही मेट्रो परियोजना लागू की गई है।
-जब तक नगर की आबादी 75 लाख से ऊपर नहीं पहुंचती है और नगर निगम का क्षेत्रफल 276 किलोमीटर पूरी तरह से आक्यूपाईड नहीं होता है, तब तक मेट्रो लाभप्रद नहीं है।