राजनीतिक मानसिकता में लगी घुन, विकास नहीं, विनाश की ओर शहर को ले जा रही है


य ह शहर स्मार्ट अधिकारियों के नहीं, पिछले 100 सालों से इस शहर के बाशिंदों और कारोबारियों के कारण स्मार्ट था, परन्तु इस शहर में यह तय है कि अधिकारी शहर को स्मार्ट सिटी का तमगा दिला ही देंगे। वैसे भी शहर में पदस्थ होने वाले तमाम अधिकारी अपनी योजनाएं लेकर इस शहर में स्थापित हो जाते हैं, परन्तु इस विकास की बयार के पीछे जिस तरीके से शहर में विनाश की बयार शुरू हो गई है, उससे शहर का मूल स्वभाव और मूल संस्कृति दोनों ही संकट में आ गई। किसी भी शहर के विकास को लेकर मूल मंत्र होता है और इसी को विकास का मूल सिद्धांत भी कहा जाता है। इस मूल मंत्र में शहर के मूल स्वरूप, मूल संस्कृति और मूल विचारों को बरकरार रखते हुए ही शहर का विकास होता है। हम विश्व की बात नहीं कह रहे, इसी देश की बात कर रहे हैं। चाहे दिल्ली का मामला हो या जयपुर का हो, या हैदराबाद का और ऐसे ही बीसियों शहरों का। इन सभी जगहों पर पुराने शहरों के संस्कारों और निर्माणों को बचाने के लिए सरकारों और शहरो के नागरिकों ने भी अपने हित का गला दबाते हुए मूल धरोहरों को नहीं छेड़ा, साथ ही संवारने का काम भी जारी रखा। दिल्ली के चांदनी चौक में अभी भी पुराने मूल स्वरूप को नहीं छेड़ा गया जो 300 साल पुराने दिल्ली को अभी भी दिखा रहा है। जयपुर महल के क्षेत्र में बने हुए पुराने मकान उसी सुंदरता के साथ कायम रखे गए हैं। इस शहर की राजनीतिक मानसिकता में इस कदर घुन लग गई है कि शहर के चौड़ीकरण को ही वे नया विकास मानते हैं। परिणाम यह हो रहा है कि पूरा शहर विकास के दबाव में विनाश की ओर चला गया है। यदि आज होलकर रियासत के कार्यकाल का शहर किसी को देखना है तो वह अब नहीं देख सकता। जहां लोग पुरानी धरोहरें और मकान बचा रहे हैं, वहीं मुट्ठीभर अधिकारी इस शहर को चौड़ी सड़कें देकर ही जाएंगे। अब एक नजर शहर की सड़कों के चौड़ीकरण को लेकर भी देख लीजिए। 5 साल पहले छावनी में विध्वंस शुरू हुआ था, आज तक आधे टूटे हुए मकान वहीं पर है, सड़क आज भी उतनी ही चौड़ी है, जितनी पहले थी। सुभाष मार्ग पर मचाई तबाही के बाद यह भी उसी तरह पड़ी हुई है। वह तो गनीमत है राजबाड़ा से मरीमाता चौराहे तक 60 फीट का रोड बनाने के लिए 4 बार भूमिपूजन किया जा चुका है। सब छोड़िए कुलकर्णी भट्टे का पुल के निर्माण को चौथे साल में प्रवेश होने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। अभी भी निर्माण का काम जारी है। 60 करोड़ में कान्ह नदी में नाव चलाने और साफ पानी बहाए जाने पर 600 करोड़ खर्च हो गए हैं। अभी भी यह गारंटी नहीं है कि साफ पानी बहेगा ही। यह सारे कार्य सिंहस्थ से पहले इस शहर में होने थे। शहर में विनाश के आधार पर विकास की लिखी जा रही इबारत के बारे में कुछ बातें और भी समझना होगी, पूरे विश्व में पुराने शहरों को बचाने के साथ नए शहरों का विकास किया जा रहा है या नए क्षेत्रों में नए शहर बनाए जा रहे हैं। पुराने शहरों को आज भी छोटी गलियां होने के बाद छेड़ा नहीं गया है, चाहे न्यूयार्क हो, चाहे लंदन हो या फिर आस्ट्रेलिया के सिडनी में 15 फीट की गलियों में घूम रहा शहर हो। हमें ऐसा लगता है कि अब इस शहर के पुरानी धरोहरों की किसी को जरूरत नहीं है। खासकर अधिकारियों को तो है ही नहीं, ऐसे में राजबाड़ा भी शहर के नाम का गौरव माना जाए यह भी संभव नहीं है। बेहतर होगा कि इसे भी तोड़कर बड़ा पार्किंग स्थल और यहां पर व्यावसायिक बाजार बना दिए जाए, जिससे कारोबार और व्यापार भी खूब बढ़ेगा। इस शहर में वैसे भी भरपूर व्यापार और कारोबार हो रहा है। 50 हजार लोग अपना घर चलाने के लिए ठेले पर सामान लेकर भय और भूख के बीच गलियों में भागते-फिरते देखे जा सकते हैं। लुटेरे उन्हें घात लगाकर तलाशते रहते हैं। हमें गर्व है इस विकसित और विकास वाले शहर पर, जिस शहर के राजनेताओं की रगों में बह रहे खून का डीएनए जरूर देखना चाहिए। इसी शहर में सुरेश सेठ और राजेन्द्र धारकर जैसे नेता भी पैदा हुए थे, जिन्होंने इसी शहर की धरोहर को बचाने के लिए योजनाओं के साथ नया शहर भी दिया था।

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