इंदौर की आठों सीटों पर सुबह से मतदान, दिग्गजों ने बताए मतदान के बाद उंगली पर लगे स्याही के निशान

इंदौर। इंदौर में इस बार बेहद फीका मतदान देखने को मिला है। कई केन्द्रों पर सुबह से सन्नाटा पसरा रहा। 34 साल बाद दूसरी बार सबसे कम मतदान का रिकॉर्ड दर्ज होगा।

इंदौर में सुबह 7 से 9 बजे के बीच दो घंटे में 11.4 फीसदी मतदान हुआ। अभी तक 15 प्रतिशत लोगों ने वोट डाले हैं। इस बार सबसे कम रिकॉर्ड मतदान हुआ है। खराबी के कारण करीब 25 ईवीएम मशीनें बदली गई वहीं महू के पास पिगडंबर में भाजपा और कांग्रेस कार्यकर्ता आपस में भिड़ गए। पुलिस ने पहुंचकर मामला शांत करवाया।कांग्रेस नामवापसी के कारण पहले ही चुनाव से बाहर हो गई है। उसने नोटो के लिए समर्थन मांगा है। इधर, वोटिंग के बाद फ्री ऑफर्स के कारण लोग अलग-अलग प्रतिष्ठानों पर भी पहुंच रहे हैं। फ्री-पोहा जलेबी भी मिल रही है। पहली बार कांग्रेस की गैरमौजूदगी के कारण भाजपा के पोलिंग एजेंट हर बूथ पर हैं, जबकि विपक्ष या अन्य प्रत्याशियों की टेबलें गिने-चुने बूथों के बाहर ही है। कलेक्टर आशीषसिंह ने बताया मॉक पोल के बाद निर्धारित समय पर सभी मतदान केंद्रों में वोटिंग शुरू हो गई है। इंदौर 2 में धीमा मतदान हो रहा है और राऊ में तेजी से मतदान चल रहा है।

8 चुनाव में सुमित्रा महाजन का परचम लहराता रहा, वोट प्रतिशत 60 के पार रहा

इंदौर। इंदौर लोकसभा चुनाव में इस बार दूसरी बार मतदान का प्रतिशत घटने जा रहा है। औसत मतदान हमेशा 62 से 65 प्रतिशत के बीच ही रहा है। वर्ष 1991 में जब भाजपा उम्मीदवार सुमित्रा महाजन थीं तो उनके सामने कांग्रेस से ललित जैन उम्मीदवार बने थे। तब आठ लोकसभा चुनाव में वर्ष 1991 में ही 48.59 प्रतिशत मतदान हुआ था। उसके बाद कभी भी 50 प्रतिशत से कम मतदान नहीं हुुआ। आठ चुनावों में सबसे ज्यादा वोटिंग पिछले लोकसभा चुनाव में हुई। तब 69.32 प्रतिशत वोटिंग हुई थी।

1991 में ललित जैन कांग्रेस के उम्मीदवार थे। वे तब मालवा की राजनीति में ताकतवर एक घराने के उम्मीदवार माने गए थे। यहां के क्षत्रपों की लड़ाई में 1996 में नया प्रयोग हुआ। तब महेश जोशी ने तत्कालीन महापौर मधुकर वर्मा को उम्मीदवार बनवा दिया। चूंकि, वर्मा जोशी के उमीदवार थे, इसलिए कांग्रेसी पीछे हट गए। 1998 में पंकज संघवी तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह की इच्छा न होने के बाद भी टिकट ले आए थे। संघवी तब रिकॉर्ड अंतर से चुनाव हारे। इंदौर के इतिहास में लोकसभा चुनाव में यह सबसे करारी शिकस्त थी। इसके बाद उन्हें 1999 में मौका मिला पर जोशी के बढ़ते कद पर अंकुश लगाने का इससे अच्छा मौका कांग्रेसियों को फिर मिलने वाला नहीं था। इसके बाद रामेश्वर पटेल दो लाख मतों से लगभग हारे। सभी चुनाव में मतदान प्रतिशत 60 के पार रहा।

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