सुलेमानी चाय-चड्डी ढीली पेंट टाइट, पगार उनकी, चाकरी इनकी,दोस्त भी दुश्मन बन जाता है

सुलेमानी चाय

चड्डी ढीली पेंट टाइट

कुर्ते पर क्लब, नेहरू जैकेट पर ड्राय क्लीन,चेहरे पर ताजगी और दिल मे उमंगे लिए वक्फ बोर्ड के नए सदर ए मोहतरम के रवैये से पूरे स्टाफ की चड्डी ढीली और पेंट टाइट हो चली है। ऑडिट अधिकारी, सर्वेयर, सभी को हफ्ते के चार दिन फील्ड में ओर बाकी दिन ऑफिस में रिपोर्ट पेश करने का हुक्म दे दिया है। साथ ही स्पॉट सेल्फी कभी ऑडर है। जिसमे के अधिकारियों को झूठी मुस्कान दिखानी पड़ रही है। इसमें काम करने वाले कुछ खुश है।तो ज्यादा दुखी है। इस सब से वक्फ का भला हो पाता है या नहीं ये तो वक्त ही बतायेगा । लेकिन फिलहाल तो, वक्फ अधिकारियों की तो पेंट ढ़ीली हो चली है।

पगार उनकी, चाकरी इनकी

अकीदत के एक ईदारे के एक कर्मचारी की वफादारी चर्चा में है। पिछले अध्यक्ष की नजर ए इनायत से नौकरी मिली थी, वफा भी उनके लिए ही है। नाम के साथ डॉक्टर जुड़ा है लेकिन सेवाएं ड्राइवर की देते आए हैं। अपने विभाग में न जाकर दूसरे इदारे की सेवा का दौर जारी रह भी जाता लेकिन अब हालत दोनों संस्थाओं के अध्यक्षों के बीच तलवार खिंचाई के बन गए हैं। सेवा छोड़ें तो आर्थिक नुकसान, वफादारी छोड़ने पर आका नाराज़ और अगर काम पर लौटे तो सरकारी दफ्तर की आठ घंटे हाजिरी, काम का बोझ और साहबगिरी की जगह चाकरी के हालात बन जायेंगे ।

दोस्त भी दुश्मन बन जाता है

इन्दौर सियासत की जुगल जोड़ी शेख और पठान के जितने किस्से दोस्ती के चले उससे ज़्यादा चर्चा दुश्मनी का हुआ दोनों के मिजाज़ में शिद्दत है। चाहे दोस्ती करे या दुश्मनी और इस दुश्मनी की वजह बनी अल्पसंख्यक मोर्चा के नगर का मुखिया बनने की चाह, पर जिनको बनाना था उनकी चाह ये दोनों ही पूरी नहीं कर पाए , और नगर सेठ मोर्चा अध्यक्ष बन गए, लम्बी सिद्दत के बाद शेख और पठान फिर हम प्याला, हम निवाला हो गए हैं लेकिन प्रदेश अध्यक्ष एजाज़ खान ने कुछ जिले बदलने की इच्छा ज़ाहिर की है अब रेहान और महफूज़ के अरमान फिर जाग गए हैं। अब देखना है इन दोनों की दोस्ती पद के लालच की भेट चड़ती हैं या पिछली गलती से सबक लेते हैं। वैसे सुलेमनी सूत्रों का कहना है,की दोनों नूरा कुश्ती भी लड़ते हैं।

दुमछल्ला… चेहरे पे चेहरा

शहर में खिदमत करने वालो की कमी नही है, जिसमे पाकीज़ा, काजी रेहान, ओर महमूद मदनी तीनो शहर की बड़ी खिदमत गुजार सख्शियत है और कई जगह बेहतर खिदमत दे भी रहे है। लेकिन जब कौम के बच्चो की पढ़ाई की बात आती है तो इन तीनो ने अपने अपने स्कूलों की फीस इतनी बड़ा रक्खी है कि कोई गरीब बच्चा इनके स्कूल में पढ़ाई के बारे में सोच भी नही सकता जबकि आज के हालात में सबसे जरूरी खिदमत मुस्लिम बच्चो की पढ़ाई है। डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस, आईपीएस जैसे हलकों में हमारी हिस्सेदारी हमारी तादाद के मुकाबिल बहुत कम है जो कि देश मे हमारे मुस्तकबिल के लिये बड़ी फिक्रमंद बात है।

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