विधानसभा क्षेत्र क्रमांक 1, 3 और 5 से ही होगा महापौर का निर्णय

लगभग 7 लाख मुस्लिम मतदाता कर सकते है संजय शुक्ला की जीत का मार्ग प्रशस्त

इंदौर।
नगर निकाय के लिए होने जा रहे चुनावों में वार्डों की स्थिति चाहे कुछ भी हो, लेकिन महापौर पद के लिए विधानसभा क्षेत्र क्रमांक १, ३ और ५ के मतदाता अहम भूमिका का निर्वाह करेंगे। यहां पर सर्वाधिक दस लाख मुस्लिम मतदाता हैं। इन तीनों विधानसभा क्षेत्रों के शहरी और ग्रामीण वार्डों के सामाजिक समिकरण कांग्रेस प्रत्याशी संजय शुक्ला की जीत का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। दूसरी ओर भाजपा के लिए ये ही क्षेत्र चुनौती साबित हो सकते है। वैसे भी जिस तरह से भाजपा द्वारा नगर निगम के ८५ वार्डों में से एक भी वार्ड में किसी भी मुस्लिम प्रत्याशी को नहीं उतारा है। उसके चलते न केवल भाजपा के मुस्लिम मतदाताओं और कार्यकर्ताओं में व्यापक असंतोष है। वहीं मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में भी तीखा आक्रोश देखने को मिल रहा है। इसके नतीजे कहीं न कहीं चुनाव परिणाम के दौरान देखने को मिलेंगे।

 

देखा जाए तो इंदौर नगर निगम जिले के आठ विधानसभा क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करता है। इनमे कुल १८.३६ लाख मतदाता है। ८५ वार्डों में फैले मतदाताओं में से क्षेत्र क्रमांक १, ३ एवं ५ विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग ७ लाख के करीब है। विधानसभा क्षेत्र क्रमांक १ के वार्ड क्रं. १ से १७ में जहां ३ लाख ९५८० मतदाता है वहीं विधानसभा क्षेत्र क्रमांक ३ में वार्ड क्रंमाक ५५ से ६४ में १ लाख ९०१६९ मतदाता हैं। इसी प्रकार विधानसभा क्षेत्र क्रमांक ५ में वार्ड ३७ से ५४ तक ३ लाख ९७४८० मतदाता हैंं। ये तीनों विधानसभा क्षेत्र ही इंदौर महापौर के चुनावों में निर्णायक भूमिका अदा करेंगे। चूंकि यहां पर सर्वाधिक मुस्लिम मतदाता है और जिस तरह से भाजपा ने मुस्लिम वर्ग को इस चुनाव में दरकिनार किया है उसका खामियाजा आगे न पीछे उसे भुगतना ही होगा। हालांकि राऊ, सांवेर, देपालपुर सहित अन्य विधानसभा क्षेत्रों में भी मुस्लिम मतदाताओं की कमी नहीं है, लेकिन सामाजिक समीकरण भाजपा के ताने बाने को छिन्न-भिन्न करने में कसर नहीं छोड़ने वाला। विधानसभा क्षेत्र क्रमांक १ और ५ में पिछड़े अल्पसंख्यक वर्ग का ही जोर है और यहां ७० प्रतिशत मतदाता इसी वर्ग से आते हैं। हालांकि विधान सभा क्षेत्र क्रमांक ३ शहरी और ग्रामीण विधानसभा वाले वार्डों पर नजर डाली जाए तो यहां सामाजिक समीकरण मिश्रित है। यहां पर यह भी महत्वपूर्ण तथ्य है कि विधानसभा क्षेत्र क्रमांक १, ३ और ५ में सघन बस्तियां और यहां पर चुनाव के दौरान प्रत्येक बूथ पर वोटिंग का प्रतिशत ७० से अधिक ही रहता है। यदि विधानसभा वार आकलन किया जाए तो राऊ विधानसभा क्षेत्र में जीत-हार का मामला नजदीकी रहता है। कुछ यही हालात सांवेर विधानसभा क्षेत्र और देपालपुर में नजर आते हैं।

पहचान की कमी पड़ सकती है भाजपा पर भारी…
देखा जाए तो कांग्रेस ने लगभग डेढ़ वर्ष पहले ही संजय शुक्ला को बतौर महापौर प्रत्याशी घोषित कर दिया था और उसके बाद से ही विधायक शुक्ला लगातार पूरे शहर में सक्रिय नजर आ रहे है। दूसरी ओर भाजपा महापौर प्रत्याशी की दौड़ में काफी पिछड़ गई, काफी लंबी जद्दोजहद के बाद कही जाकर भाजपा की ओर से पुष्यमित्र भार्गव को महापौर का अधिकृत प्रत्याशी घोषित किया गया। अधिवक्ता पुष्यमित्र भार्गव को भाजपा के ही कई नेता और कार्यकर्ता नहीं जानते। कुछ कार्यकर्ता तो उन्हें पेराशूट प्रत्याशी भी घोषित कर चुके हैं। पहचान की यह कमी भाजपा को इस चुनाव में भारी भी पड़ सकती है। हालांकि भार्गव को उम्मीद है कि विद्यार्थी मोर्चा में किए गए कामों और संघ की मदद से वे अपनी नैया पार लगा लेंगे, लेकिन यह इतना आसान नहीं है। दूसरी ओर संजय शुक्ला शहर के मतदाताओं के लिए एक जाना पहचाना चेहरा है और उनकी अपनी एक लंबी राजनैतिक पारी रही है। जिसका फायदा उन्हें मिलेगा इसमे कोई दोराहे नहीं हो सकती।

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