होलकर राज परिवार के वैभव और इंदौर की शान का प्रतीक राजवाड़़ा

मराठा, मुस्लिम और पश्चिमी स्थापत्य कला का अनोखा संगम

इंदौर। जिस तरह से चारमिनार हैदराबाद की, गेटवे ऑफ़ इंडिया तथा ताज महल होटल मुंबई की तथा इंडिया गेट दिल्ली की पहचान हैं उसी तरह राजवाड़ा इंदौर का प्रतिनिधित्व करता है.राजवाड़ा होलकर शासकों का ऐतिहासिक महल तथा निवास स्थान था तथा इसका निर्माण सन 1747 में होलकर वंश के संस्थापक श्रीमंत मल्हार राव होलकर ने करवाया था. वे इस महल का उपयोग अपने निवास स्थान के रूप में करते थे तथा सन 1880 तक वे यहीं रहे थे.
इसके निर्माण में मराठा, मुग़ल तथा फ्रेंच वास्तुकला शैली का मिला जुला स्वरुप दिखाई देता है. ऐसी ही मिली जुली शैली से उस दौर में कई धार्मिक स्थल बनाए जाते थे। इस स्थापत्य कला की वजह से ही उस दौर में बनने वाले धार्मिक स्थलों में होने वाले निर्माण में मिली जुली शैली देखने को मिल जाती है। मंदिर के क्लश, गुंबद और और मस्जिद पर बनने वाली मेहराबों में की जाने वाली कारीगरी भी लगभग एक जैसी ही होती थी। यह विडंबना ही है कि वर्तमान दौर में यही मिली जुली कारीगरी कुछ जगह विवाद की भी वजह बन रही है।
राजवाड़ा के निर्माण के अधिकतर भाग में लकड़ी का उपयोग किये जाने की वजह से अपने इतिहास में यह अब तक दो बार जल चूका है. आखरी बार यह सन 1984 में आग की लपटों की भेंट चढ़ा था जिसमें राजवाड़ा को अब तक का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ था, तथा अब इसे एक गार्डन का रूप दे दिया गया था. सन 2006 में इंदौर की तत्कालीन महारानी उषादेवी होलकर ने इसका पुनर्निर्माण करवाने की योजना बनाई तथा उनके प्रयासों से सन 2007 में यह फिर से बन कर खड़ा हो गया. यह भारत का पहला ऐतिहासिक भवन है जिसका पुनर्निर्माण उसी सामग्री, उसी शैली तथा उसी पद्धति से किया गया है जिससे वह अपने वास्तविक स्वरुप में पहली बार बनाया गया था.
राजवाड़ा का निर्माण कल हुआ इस पर इतहासकारों में मदभेद है। कई इसका निर्माण १७४७ का लिखते है तो कही १७६६ में इसका निर्माण होना बताया गया है। कुछ लोगों ने १८०१ और कुछ ने १८११ के आसपास बताते है। लेकिन यह एक तथ्य है कि सिंध्या महाराज की फौज के आक्रमण के समय राजवाड़ा मौजूद था। उन्होने इसे आग लगा दी थी। जिससे बड़ा नुक्सान हुआ था। इस लिए कुछ लेखक इस दौर के राजवाड़ा को जूना राजवाड़ा भी कहते है। और इसके पास में बस रही आबादी का नाम जूनी इंदौर पड़ गया था।

सिंधिया के सैनिकों ने लगाई थी आग


माता अहिल्या बाई के देहावसान के बाद इंदौर का होल्कर राजघराना कई प्रशासनिक विपदाओं का शिकार हो रहा था। ग्वालियर महाराजा दौलतराव सिंधिया ने भी पैशवा से अपने संबंध मजबूत बना लिए थे। इसकी बड़ी यह थी कि सिंध्या चाहते थे कि होलकर का शासन उनके समर्थक के हाथों आ जाए। अपने शासन को मजबूती देने के लिए यशवंत राव जब नागपुर मदद लेने पहुंचे तो उन्हे सिंधिय महाराज के कहने पर बंदी बना लिया गया। जैसे तैसे अपने वफादार साथियों की बदौलत महाराजा यशवंतराव होलकर वहां से छूटे और जुलाई १८०१ में उन्होने उज्जैन पर हमला कर दिया। इससे सिंध्या महाराज ने बदला लेने के लिए नवम्बर १८०१ में एक बड़ी सैना लेकर इंदौर पर बड़ा हमला करने की ठान ली। महाराजा यशवंत राव ने भी बड़ी फौज लेकर मुकाबला करने का मन बना लिया था। दौनो घरानों की फौज इंदौर के समीप तेजपुर गड़बड़ी के पास जमा हुई। इसी वजह से इस जगाह का नाम तेजपुर गड़बड़ी पड़ा था। लेकिन इस युद्ध में होल्कर महाराज की हार हुई। और सिंध्या सैनिक दस्ते के सेना पति सरजेराव घाटगे ने इंदौर में १५ दिन से ज्यादा लूटपाट की । ले खकों ने लिखा है कि इस लूटपाट के दौरान राजवाड़े को भी आग लगा दी गई थी। जिससे बड़ा नुकसान हुआ था। सिंधिय की सैना ने नगर के ही सराफा में भी लूटपाट की थी और काफी धन लूटकर ले गए थे।राजवाड़ा में एक और अग्रि़कांड १९८४ में हुआ था। इस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़़के सिख विरोधी दंगों में यह जल गया था। दंगाइयों ने राजवाड़़ा के पास लगी कुछ दुकानों को जलाया था इसी आग ने राजवाड़़ा को अपनी चपेट में ले लिया था। १८३४ में भी राजवाड़़ा की पांचवी मंजिल आग की चपेट में आ गई थी।

अंग्रेजों ने राजबाड़़ा में ली थी पनाह
इंदौर के विकास की हर ऊंचाई को देखने वाले राजबाड़ा कई ऐतिहासिक घटनाओं को साक्षी रहा है। ये वही राजवाड़ा है जिसने १८५७ के विद्रोह में जान बचाकर भगने वाले अंग्रेज अफसरों को भी पनाह मिली थी। जब विद्रोहियों को खबर लगी की कुछ अंग्रेज राजबाड़़ा में छिपे हुए है तो उन्होने महाराज से उनकी मांग की तब महाराज ने दो टूक कहा था कि वह इन लोगों को किसी भी कीमत पर विद्रोयिों के हवाले नहीं करेंगे। एक जुलाई १८५७ से होल्कर सैनिक सआदत खान ने अपने साथियों के को साथ लेकर रेसीडेंसी पर हमला बोल दिया था। इस समय रेसीडेंसी में लगभग ८० से ज्यादा अंग्रेज अधिकारी उनकी पत्नियां और बच्चे रहते थे। रेजीडेंट एच एम डूरंग तो कुछ लोगों के साथ महू भाग निकला था। कुछ यूरोपील लोगों ने महाराजा तुकोजीव ( द्वितीय) से शरण मांगी थी। तब महाराज ने उन्हे राजबाड़़े में पनाह दी थी। े इस विद्रोह के बाद चार दिन तक रेसीडेंसी पर क्रांतिकारियों का कब्जा रहा था। सभी लोग रेसीडेंसी छोड़़कर भाग निकले थे। लगभग ४० से ज्यादा अंग्रेज विद्रोहियों का शिकार बने थे और उनकी लाशे उठाने वाला भी कोई नहीं था। चार दिन तक उनके शव रेसीडेंसी में ही पड़़े रहे थे। मेरठ और नीमच में हुई बगावत के बाद इंदौर के होलकर सिपाहियों ने भी विद्रोह का झंडा बुलंद कर दिया था। और फिर इंदौर से प्रेरणा लेकर महू छावनी में भी भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद कर दी थी। 

एतिहासिक रंग पंचमी और गीत संगीत की महफिलों का गवाह दरबार हाल
महाराजा मल्हार राव होल्कर की कोशिशों से अपने भव्य रूप में स्थापित राजबाड़़ा कई उत्सवों का भी गवाह रहा है। यहां के दरबार हाल में कई आयोजन हुआ करते थे। जिसमें गीत से लेकर पहलवानों के दंगल भी आयोजित होते थे। शिवाजीराव को पहलवानी का बड़़ा शौक था वह देशभर के नामी पहलवानों को यहां आमंत्रित करते थे। रानी सराय ( वर्तमान में महाराजा टाकिज) उन्हे ठहराया जाता था। इसी का साथ गीत संगीत की महफिलें भी खूब जमती थी। महाराजा तुकोजीराव ( द्वितीय ) का काल में नाना साहब पानसे, नसीरूद्दीन खा, उस्ताद बाबू खां, बुंदू खा और जहांगीर खान यहां अलग-अलग कलाओं को सिखाते भी थे और दरबार भी लगाते थे।

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