50 किलोमीटर लम्बे रास्ते के डिवाईडर पर 100 जानलेवा रास्ते

बाणगंगा, सांवेर और नानाखेड़ा थानों के साथ ही दर्जनभर पंचायत की सीमा लगती हैं इस बायपास पर

इंदौर (धर्मेन्द्रसिंह चौहान)।
इंदौर-उज्जैन 50 किलोमीटर लम्बे बायपास रोड के डिवाईडर को कई जगह से काट कर कुछ लोगों ने 100 से ज्यादा जान लेवा रास्ते बना दिए। एमपीआरडीसी द्वारा संचालित इस टोल रोड का रखरखाव करने वाली महाकाल कंपनी ने तीन थानों में इसकी शिकायत भी की मगर कार्रवाई नहीं हुई। ऐसे में 50 किलोमीटर के इस सफर में अचानक कौन कहां से आ जाए पता ही नहीं चलता। जिससे यहां हर माह कम से कम 10 हादसे होते रहते हैं। वहीं पिछले कुछ सालों में 10 से 15 लोगों की मौत तक हो चुकी है। बाणगंगा, सांवेर और नानाखेड़़ा तीन थानों के साथ ही दर्जनभर पंचायत की सीमा से लगे इस बायपास के डिवाईडरों को तोड़ कर यह जानलेवा रास्ते किसने बना दिए यह किसी को नहीं पता।
प्रदेश में वाहन चालकों के आरामदायक सफर के लिए प्रशासन ने मध्य प्रदेश रोड डवलपमेंट कार्पोरेशन को यह रोड सिंहस्थ के पहले बनाने के लिए ठेका दिया था। इंदौर से उज्जैन तक 50 किलोमीटर लम्बा यह बायपास फोर लेन बनाया है। इस फोर लेन के बीच में बने डिवाइडर पर ग्रीन बेल्ट बनाकर हरियाली का भी विशेष ध्यान रखा गया। मगर समय रहते इसके डिवाईडर पर लोगों ने अपनी सुविधा अनुसार 100 से ज्यादा जगह से रास्ते बना दिए। बाणगंगा, सांवेर और नानाखेडा थानों की सरहद में बने होने के कारण टोल कंपनी ने तीनों थानों में इन अवैध रास्तों की शिकायत भी की मगर किसी भी पुलिस थानों की पुलिस यह पता लगाने में असफल रही कि यह जानलेवा रास्ते किन लोगों ने बनाए। दैनिक दोपहर की टीम ने जब इन जानलेवा रास्तों की पड़ताल की तो कई चौकाने वाले दावे सामने आए। टीम ने इन डिवाईडर पर बने जानलेवा रास्ते के आस-पास ढाबा संचालकों से बात की तो उन्होंने कहा कि यह पेट्रोल पंप वालों ने बना दिए। जब पेट्रोल पंप वालों से बात की तो उन्होंने कहा यह ढाबे वालों के द्वारा बनाए गए रास्ते हैं। दोनों बयानों में उलझी दोपहर टीम ने जब एक दुसरे पर लगाने जाने वाले आरोपों के बारे में बात की तो इन्होंने आस-पास के गांव वालों पर पूरा मामला पलट दिया। कुछ ढाबा संचालक और पेट्रोल पंप के कर्मचारियों ने यह तक कह दिया कि यह रास्ते तो गांव वालों ने अपनी सुविधा के लिए बनाए हैं। यही कारण हैं कि पुलिस ने किसी पर एफआईआर नहीं की। अगर इन रास्तों को कोई पेट्रोल पंप या ढाबे वाला बनाता तो क्या पुलिस उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं कर सकती थी। मगर यह रास्ते उन गांव वालों ने बना दिए जिन्हें 2 से 4 किलोमीटर घुम कर आना-जाना पड़ता था। गांव वालों द्वारा अपनी सुविधा अनुसार डिवाईडर के बीच से बनाए गए इन रास्तों का फायदा गांव वालों को ही होता हैं। पेट्रोल पंप और ढाबों पर आने वाले तो 2-4 किलोमीटर घुम कर भी आ सकते हैं। इसके बाद टीम ने कुछ गांव वालों से इन जानलेवा रास्तों के बारे में बात की तो मामला पूरी तरह उलट गया। गांव के लोगों को कहना हैं डिवाइडर को तोड़ कर रास्ता बनाने के लिए भारी मशीनों की आवश्कता होती हैं जो किसी भी ग्रामीण के पास नहीं हो सकती। किसी भी डिवाईडर को जेसीबी जैसी मशीन की सहायता के बगैर नहीं तोड़ा जा सकता है, और यह मंहगी मशीन सिर्फ पेट्रोल पंप और ढाबा चलाने वाले ही वहन कर सकते हैं। क्योंकि इन रास्तों से ही इनके व्यापार का रास्ता खुलता हैं। ग्रामीणों को 2-4 किलोमीटर घुम कर आने-जाने में कोई परहेज नहीं, जबकि ढाबा और पेट्रोल पंप वालों का ग्राहक आगे निकल जाता है। वह आगे नहीं जाए इसलिए ही यह रास्ते बनाए गए हैं। इसके बाद टीम ने कुछ पुलिस वालों से बात की तो उनका कहना था कि थाना स्तर पर ज्यादा कार्रवाई नहीं कर सकते हादसों की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचा दी जाती है। वहीं टोल कर्मचारियों का कहना हैं कि कई कट तो हमने खड़े रहकर बंद कराए थे, उसके बाद फिर रातो रात यह कट बन गए इसकी शिकायत पुलिस को भी की जाती हैं मगर पुलिस हैं कि कोई कार्रवाई नहीं करती। इसी तरह 50 किलोमीटर के इस रास्ते पर बनाए गए जानलेवा रास्ते किसने और क्यों बनाए इसकी जानकारी न तो टोल कंपनी के पास हैं और न ही तीनों थाने के साथ ही दर्जन भर पंचयत यह जानती हैं कि बाय पास के डिवाईडर को तोड़ कर यह रास्ते कौन बना गया।

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