तनी भाजपाई और मनी भाजपाई के बीच दरार खत्म नहीं हो पा रही…

तनी भाजपाई और मनी भाजपाई के बीच दरार खत्म नहीं हो पा रही...
तनी भाजपाई और मनी भाजपाई के बीच दरार खत्म नहीं हो पा रही…

राजनीति में लंबे समय टिके रहने के लिए कंधे की तलाश अच्छे नेता हमेशा करते रहते हैं। ले-देकर आखिरी में सबको अपने कंधे ही काम आते हैं। जिन नेताओं ने कहा मुझ पर भरोसा रखो, उन पर उनकी पार्टी वालों को ही भरोसा नहीं रहा। जो कभी अभूतपूर्व हुआ करते थे, कंधों के चक्कर में भूतपूर्व हो गए। इधर प्रदेश को इक्कीसवीं सदी में ले जाते खुद बीसवीं सदी में चले गए। निचोड़ यह भी है कि कंधे मजबूत भी होते हैं और कमजोर भी, पर इन्हीं के साथ कुछ कंधे मजबूर भी होते हैं और कुछ स्वार्थी भी। इन्हीं कंधों के बीच इन दिनों ग्वालियर राजघराने की राजनीति घूम रही है। ज्योति बाबू भले ही भाजपा का दामन थाम चुके हों, पर मन से अभी भी वे कांग्रेसी बने हुए हैं। कुछ ऐसा मामला प्रदेश के कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री रहे माधवराव सिंधिया की स्मृति में आयोजित आयोजन में दिखा।

पुण्यतिथि के दिन सुबह ग्वालियर में ज्योति बाबू ने उनकी स्मृति में मैराथन दौड़ का आयोजन भाजपा के झंडे तले किया। इस दौरान सुबह सिंधिया के साथ तन से भाजपाई हुए नए भाजपाई इसमें खूब दौड़े, परंतु जो तन और मन से भाजपाई थे, वे अपनी दूरी बनाए रखने में लगे रहे। यह बात छोटी नहीं है, क्योंकि जब शाम को मामाजी यहां पहुंचे तो भाजपा की सारी भजन मंडली धूम-धड़ाके के साथ पहुंच गई, यानी तन और मन से भाजपाई यहां पर मुख्यमंत्री के साथ जमे रहे। भाजपा नेताओं का कहना यह है कि पहली बात तो हम ज्योति बाबू के पिता के गुणगान क्यों करें। हम राजमाता के गुणगान कर सकते हैं, पर यह परंपरा तो पूरी तरह गलत है।

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आपके पिता का कार्यक्रम है, वे कांग्रेसी थे। उनकी स्मृति में कार्यक्रम रखना कांग्रेसियों का काम है। ऐसे तो अर्जुनसिंह की बेटी मीना सिंह भी भाजपा में पदार्पण कर चुकी हैं। अब वे अपने पिता की स्मृति में जन्म शताब्दी समारोह भाजपा के झंडे तले आयोजित करेंगी तो क्या भाजपा अर्जुनसिंह का गुणगान करेगी? भाजपा की विचारधारा और संस्कृति में भाजपा के लिए समर्पित नेता और कार्यकर्ता की स्मृति में आयोजन हो सकते हैं, उनके परिजनों की स्मृति में नहीं हो सकते। यही बात जो है सिंधिया भाजपाई और मूल भाजपाइयों के बीच दूरी बना रही है। इधर पिछले दिनों गुना के सांसद के.पी. यादव द्वारा राजघराने के पुरखों पर उंगली उठाए जाने को लेकर बड़ा बवाल मचा था। अतत: के.पी. यादव को चुप होना पड़ा। इस मामले में भाजपा में ही दरारें चौड़ी हो रही हैं कि के.पी. यादव ने गलत क्या बोला। जो इतिहास है, वह तो सबको स्वीकार करना पड़ेगा और यह भी सही है कि पुरखों की गलतियों पर पीढ़ियों पर दोषारोपण नहीं हो सकता। यह तो पीढ़ियों को भी स्वीकार करना पड़ेगा कि जो इतिहास है, वह इतिहास है।

-9826667063

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