गुस्ताखी माफ़-रिसायत हमारी सियासत हमारी फिर भी सुनवाई नहीं…भिया इंदौर में तो पेलवान की ही तूती…न खुदा मिले न मिसाल-ए-सनम…

रिसायत हमारी सियासत हमारी फिर भी सुनवाई नहीं…
दिल्ली से भोपाल तक इन दिनों भाजपा की तूती बोल रही है। बोल ही नहीं रही है, खौल रही है। इसके बाद भी इंदौर के हर विधानसभा के विधायकों और पार्षदों को नगर अध्यक्ष गौरव बाबू के साथ मिलकर अधिकारियों के साथ नैन मिलाना पड़ रहे हैं। कारण यह है कि एक ही बात कोई अधिकारी सुनता नहीं है। जब सुनता नहीं है तब शहर में इतना अच्छा हो रहा है और सुनने लगेंगे तो क्या होगा? हर विधानसभा के विधायक अपने सिपहसालारों के साथ पिछले दिनों रेसीडेंसी कोठी पर नगर निगम के अधिकारियों से मोर्चा लेने के लिए कवच-कुंडल के साथ गए थे। हर विधायक और उनके सिपहसालार पार्षदों ने नगर निगम के अलावा अन्य अधिकारियों पर भी जमकर प्रहार किए। कहा गया कि फोन नहीं उठ रहे हैं और पूर्व पार्षदों के काम नहीं हो रहे। क्षेत्र क्रमांक चार की विधायक और पूर्व महापौर को यहां तक कहना पड़ा कि मुझे प्रधानमंत्री तक अभी भी महापौर ही कहते हैं। शिवराजजी भी यही कहते हैं। इसके बाद भी सुनवाई नहीं होना दु:खद है। दो नंबरियों की तो बात ही अलग है। इस क्षेत्र में सुविधाएं बरस रही हैं। बाबा की कृपा से भरपूर आनंद है। हालांकि भोजन-भंडारे बंद हैं, पर न टैक्स की चिंता है, न जलकर की। ऐसा रामराज्य होने के बाद भी कोई सुनवाई नहीं का रोना यहां पर भी रहा। ऐसे में किसी के नंबर बढ़े हों या न बढ़ें हो, गौरव बाबू ने भोपाल तक अपने नंबर अच्छे-खासे बढ़ा लिए हैं। अब देखना होगा कि उनके बढ़ाए हुए नंबर किसके नंबर कम करने में काम आएंगे, क्योंकि कहा तो यही जाएगा कि गौरव बाबू ने अधिकारियों और भाजपा नेताओं के बीच शानदार समन्वय करवा ही दिया।
भिया इंदौर में तो पेलवान की ही तूती…
भाजपा कार्यकर्ता अब यह मानने लगे हैं कि अफसरशाही पूरी तरह शहर पर भारी हो गई है। सरकार भले ही भाजपा की हो अफसरशाही को भाजपा के मंत्रियों का इस कदर संरक्षण है कि इंदौर से किसी भी अधिकारी को हिलाया नहीं जा सकता है। पिछले दिनों एक भ्रष्ट अधिकारी को लेकर इंदौर के प्रभारी मंत्री के दरवाजे चंद भाजपा नेता प्रमाण के साथ पहुंचे थे। प्रभारी मंत्री तो नहीं मिले परंतु उनके स्टाफ ने यह संकेत दे दिया था कि इंदौर में पेलवान के बिना पत्ते हिलना संभव नहीं है। ज्यादा अच्छा होगा आप इस मामले में पेलवान को ही संपर्क कर ले। कुल मिलाकर उन्होंने बता दिया कि यह सरकार किसकी है। दूसरी ओर इससे ज्यादा दयनीय स्थिति क्या हो सकती है कि नगर अध्यक्ष को शहर के भाजपा के विधायकों और पार्षदों को लेकर अधिकारियों के साथ बैठना पड़ रहा है। वहीं पेलवान के इशारे पर काम हो रहे है। प्रभारी मंत्री के बंगले पर तो यहां तक भी बात चल गई कि भिया हालत कैसी है आप खुद समझो कि ऐलान के बाद भी समितियों में अभी तक कुछ नहीं हो पाया है। काहे को बेकार में यहां आकर पैसा और समय खराब कर रहे है। अभी तो पेलवान ही इंदौर के सिकंदर है। बस…
न खुदा मिले न मिसाल-ए-सनम…
तमाम हाथ-पांव मारने के बाद भी अंतत: खंडवा से मोघेजी अपना टिकट पक्का नहीं करवा पाए। अब वे भाजपा के सलाहकार मंडल के नेताओं में शामिल होने जा रहे हैं, यानी पचहत्तर-प्लस वाले समूह में अब उन्हें आगे का जीवन बिताना है। उनके द्वारा भोपाल में जमाई गई चौसर पर कार्यकर्ताओं के प्रदर्शन के बाद भाजपा ने उपचुनाव में उन्हें स्टार प्रचारक भी नहीं बनाया है, यानी अब मोघेजी का भाजपा में किसी पद पर पहुंचने का समापन हो गया है। उन्हें इस मामले में सत्तन गुरु को अपना गुरु मान लेना चाहिए और अब सच को भी स्वीकार करने के बाद आराम करना चाहिए। दूसरी ओर जो थोड़ी-बहुत राज्यपाल की संभावनाएं थीं, वह भी अब समाप्त हो गई हैं। अब देखना होगा, उनके दरबार के रत्नों में से कौन से रत्न कौन-सी दुकान पर वापस चमकने के लिए पहुंच रहे हैं।

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