गुस्ताखी माफ़- कांग्रेस राम से बची हे राम पर पहुंची…फिर तारीख पे तारीख…इतिश्री मोघे अध्याय समाप्तम…

कांग्रेस राम से बची हे राम पर पहुंची…
कांग्रेस इन दिनों अपने घर के चिरागों से ही परेशान है। घर में आग लग रही है, घर के चिराग से। कालिदासों से भरी पार्टी मैदानी लड़ाई लड़ने से पूरी तरह बाहर हो चुकी है। भोपाल के कमरों में बैठकर ज्ञान बघार रहे बड़े नेता की स्थिति यह हो गई है कि उनकी जमीन ही खत्म हो गई है। संगठन खड़ा नहीं हो पा रहा है और कार्यकर्ता अब पूरी तरह से टूट चुके हैं। कांग्रेस राम से बचते-बचते हे राम तक पहुंचने की स्थिति में आ गई है। तमाम कोशिशों के बाद भी पार्टी का जमीनी संगठन एक भी जिले में खड़ा नहीं हो पाया है। कांग्रेस के मुखिया भोपाल में केवल वहीं से दूरबीन लगाकर जिन लोगों के भरोसे अपने उम्मीदवारों को सर्वे के आधार पर उतारने की कोशिश कर रहे थे, वे खुद ही अच्छी तरह समझते हैं कि उनके पुराने दो सर्वे की क्या स्थिति थी। कांग्रेस के कालिदासों की हालत यह है कि वे खुद को बचाने के चक्कर में डगाल तो काट रहे हैं, पर साथ में खुद भी गिरने के लिए तैयार हो रहे हैं। कांग्रेस के तमाम जमीनी नेताओं की एक ही शिकायत है कि आज भी कमलनाथ कार्यकर्ताओं के सम्पर्क में नहीं हैं। वे केवल भोपाल से ही पूरे प्रदेश में संगठन तैयार कर रहे हैं।
फिर तारीख पे तारीख…
लंबे समय से निगम-मंडलों में सियासी नियुक्तियों को लेकर इंतजार कर रहे भाजपा नेताओं को अब दिसंबर तक नए सिरे से इंतजार करना होगा। उपचुनाव की तारीखें घोषित होने के बाद पूरी ताकत सत्ता और संगठन की यहां सीटों को जीतने के लिए लगेगी। ऐसे में मंत्री का दर्जा पाने वाले कई उम्मीदवारों को फिर और रुकना होगा। भाजपा के कई दिग्गज नेता के अलावा केंद्रीय मंत्री ज्योति बाबू के भी कई समर्थक नियुक्तियों के लिए पपीहे की तरह चोंच खोले इंतजार कर रहे हैं। डेढ़ साल की उथल-पुथल और सत्ता परिवर्तन के बीच मुख्यमंत्रीजी ने गली में एक-एक रन बनाते हुए आधा दर्जन से अधिक निगम-मंडलों में नियुक्तियां कर दी हैं, पर जब भी ज्योति बाबू के समर्थकों का नंबर आता है, रायता फैल जाता है।
इतिश्री मोघे अध्याय समाप्तम…
खंडवा लोकसभा चुनाव को लेकर इन दिनों भाजपा में अच्छी खासी उठापटक दिखाई दे रही है। भाजपा के बड़े नेता आखिरी तक भी कांग्रेस के एक बड़े नेता को भाजपा में लाकर उम्मीदवार बनाने के लिए बांट जोह रहे थे। दूसरी ओर किसी जमाने में पूरे मध्यप्रदेश के उम्मीदवारों पर फैसला लेने वाले कृष्णमुरारी मोघे जो संगठन पुरुष भी रहे पिछले दिनों भोपाल में अपने चेले-चपाटियों को लेकर मैदानी लड़ाई भी लड़ते रहे, जबकि वे अच्छी तरह जान रहे थे कि भाजपा की नई संस्कृति में 75 पार के लिए कोई जगह नहीं बची है। 75 से नीचे वाले भी इन दिनों घर ही बैठ रहे हैं। तो ऐसे में उन्हें सारे नाटक नौटंकी छोड़कर सबक सीखना चाहिए और उदाहरण के लिए लोकसभा अध्यक्ष रही सुमित्रा महाजन को देखना चाहिए। पार्टी के आदेश को उन्होंने पूरी तरह स्वीकार किया। यही स्थिति इस उम्र के और नेताओं की भी रही है। आश्चर्य की बात यह है कि जब वे खुद ही कार्यकर्ताओं को यह समझाते थे कि पार्टी किसी दबाव में नहीं आती है तो फिर वे अपने चेले चपाटियों को लेकर भोपाल में किस बात की उछलकूद कर रहे हैं। हां यह हो सकता है कि इन दिनों राजनीति का मूल सिद्धांत है चूल्हे में जाए तोप का लाइसेंस मांग लो चाकू का तो मिल ही जाएगा। कुछ ना मिला तो निगम मंडल तो है ही अब उन्हें कौन समझाए मामाजी ने पिछले उपचुनाव में इतनी लोंग मथर कर बांट रखी है कि यदि नियुक्ति प्रारंभ की गई तो निगम मंडल के अलावा बंडल की नियुक्तियां भी हो जाएगी और अभी इस उपचुनाव में भी कम से कम दस निगम मंडल के और लालीपाप दिया जाना तय है।

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