गुस्ताखी माफ़-‘उम्मीदÓ से होने के बाद गाई कविता…अब दादुर बोलेंगे, फिर सुनेगा कौन।

‘उम्मीदÓ से होने के बाद गाई कविता…
शहर में अब एक और कवि मंच पर अपनी प्रस्तुति देकर कविता पाठ करने लगे हैं। कुछ दिन पहले क्रिश्चियन कॉलेज के प्रांगण में इन नए कवि की लांचिंग कवि सम्मेलनों का संचालन करने वाले सत्येंद्र वर्मा ने करवाई। उन्होंने यह भी बताया कि वे अस्सी के दशक से कविताएं लिख रहे थे। एक पंचवर्षीय वे विधायक रहे तो सरकार के गुण गाते रहे। इन दिनों हालांकि वे उम्मीद से हैं, इसलिए अपनी ही पार्टी के कुछ लोगों के लिए मन ही मन भजन भी गाते हैं और कोई छेड़ दे तो कव्वाली की तो कोई जोड़ ही नहीं है। आप सोच रहे होंगे, ये कौन से कवि हैं… तो हम बता देते हैं, ये हैं गोपी बाबू, यानी गोपी नेमा। क्रिश्चियन कॉलेज प्रांगण में काका हाथरसी को लेकर आयोजित कवि सम्मेलन में उन्होंने भी मंच से आग्रह के बाद अपनी कविता ठोक दी। हालांकि इस दौरान कांग्रेस के उन विधायक अश्विन जोशी यानी बाबा भी मौजूद थे। उनसे भी आग्रह किया गया तो उन्होंने हाथ जोड़ लिए। वैसे भी इन दिनों कांग्रेस में तुलसीदास की दोहावली जैसा माहौल है। तुलसीदास ने कहा था…
अब पावस ऋतु आई है, भई कोकिला मौन,
अब दादुर बोलेंगे, फिर सुनेगा कौन।
यानी वर्षा ऋतु में जब सभी जगह मेंढकों की टर्र-टर्र हो रही हो तो कोयल की आवाज कौन सुनेगा। हालांकि गोपी बाबू ने बेहतर कविता पाठ किया। हालांकि वे उम्मीद से हैं और घर में कहा जाता है कि घर में कोई उम्मीद से हो तो मिठाई की संभावना बनी रहती है। हालांकि उन्होंने कुछ गाया नहीं, थोड़े दिन बाद वे भी यह गाते मिलें तो आश्चर्य नहीं होगा…
मन डोले, मेरा तन डोले, मेरे दिल का गया करार,
दो साल से ले रहा था जो गोली, उसका उतर गया बुखार।
बची आंखें अब ‘हरिरामÓ हो गई…
मध्यप्रदेश से अब राज्यसभा के लिए भाजपा के ही दिग्गज नेताओं का पहुंचना भविष्य में भी असंभव होता जा रहा है। पिछले सप्ताह राज्यसभा की मध्यप्रदेश से खाली हुए एक सीट को लेकर मध्यप्रदेश के ही कई नेताओं की नजरें लगी हुई थीं। अंदर मन से अपने स्तर पर सबके प्रयास थे परंतु एकदम नया नाम आने के बाद मध्यप्रदेश के नेताओं को फिर खाली हाथ ही रहना पड़ा। वैसे भी अब मध्यप्रदेश की राजनीति को देखने के लिए दिल्ली में बैठे भाजपा के दिग्गज दो ही आंखों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसमें एक मामाजी की है तो दूसरी ज्योति बाबू की। मामा की दूरदृष्टि ज्योति बाबू की दूरदृष्टि से ज्यादा मजबूत है, इसलिए दूसरी आंख को पहली आंख से संतुलन बनाकर ही चलना होगा, परंतु यह तय हो गया है कि मध्यप्रदेश की राजनीति में यदि चार कदम भी चलना हो तो अब इन ही दो आंखों की जरूरत पड़ेगी। इसके अलावा किसी तीसरे नेत्र की जरूरत अब दिल्ली में नहीं रह गई है और जो है, उनकी आंखें हरिराम की तरह ही केवल काम आ सकती हैं, यानी 2023 के मुहूर्त का इंतजार करने के अलावा अब भाजपा नेताओं के पास कुछ भी नहीं रह गया है।

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