माता अहिल्या ने कहा इंदूर और अंग्रजों ने बना दिया इंदौर

इंदौर। हमारा इंदौर आज देश ही नहीं विदेशों में भी जाना और पहचाना जाता है। यहां के पहने वालों की जिंदादिली और हर बाहरी को अपनाने और जगह देने के व्यवहार ने इंदौर को इस मुकाम तक पहुंचाया । मुगल शासन के बाद होल्कर और फिर ब्रिटिश शासन के अधीन रहे इस शहर ने महेशा आगे बढ़ना ही सीखा । शहर से १६ मील दूर कम्पेल के जमीदारों ने सबसे पहले इंदौर को व्यवसायिक केंद्र बनाया था। १७१५ में राजा नंदलाल मंडलोई के साथ कई जमीदार इंदौर आकर बस गए थे। यहीं से शहर का विकास शुरू हुआ । तब से लेकर आज तक कई राजनीति उतार चढ़ाव तो आए लेकिन इंदौर ने अपने विकास की गति को कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया। १८५७ की क्रांति के दौरान कुछ समय तक अस्थिरता रही लेकिन शहर जल्द ही इस अफरा तफरी से उबर गया।

कई सौ साल पहले जब इंदौर, इंदौर नहीं था। जी हां, इसके इंदौर बनने की कहानी आपको बताते हैं और बताते हैं यहां के गौरवशाली इतिहास और स्थलों के बारे में। कैसे इंद्रपुरी से इंदुवर , उसके बाद इंदूर और इंदूर से इंदौर बना।दरअसल, इंदौर को मप्र की आर्थिक राजधानी, मिनी मुंबई तक कहा जाता है। हर तरफ इसका नाम है लेकिन इसकी शुरुआत 3 मार्च 1716 को हुई थी जब इंदौर के राजा राव नंदलाल मंडलोई ने मु$गल बादशाह से फरमान हासिल कर इंदौर को टैक्स फ्री जोन बनाया था। पुरातत्व विभाग में उपलब्ध जानकारियों के मुताबिक इंदौर पर आधिपत्य के लिए बंगाल के पाल, मध्य क्षेत्र के प्रतिहार और दक्षिण के राजपूतों के बीच आठवीं शताब्दी में त्रिकोणीय संघर्ष हुआ। इसमें कभी पालों का, कभी प्रतिहारों का और कभी राजपूत शासन रहा। आठवीं शताब्दी में राजकोट के राजपूत राजा इंद्र तृतीय त्रिकोणीय संघर्ष में जीते तो इस विजय को यादगार बनाने के लिए उन्होंने यहां पर एक शिवालय की स्थापना की और नाम रखा इंद्रेश्वर महादेव। इसी मंदिर के कारण शहर का नाम इंद्रपुरी हो गया।

अठारहवीं शताब्दी में मराठा शासनकाल में इंद्रपुरी का नाम बदलकर इंदूर हुआ और यही जुबां पर चढ़ा। अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बिट्रिशों ने इंदूर का नाम अंग्रेजी में ढ्ढहृष्ठह्रक्र किया और बाद में बदलकर ढ्ढहृष्ठह्रक्रश्व कर दिया। इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका में 1715 में इंदौर को मराठा प्रमुखों से व्यापार में रुचि रखने वाले जमींदारों द्वारा बसाया जाना बताया गया है। 1741 में कंपेल के इन्हीं जमींदारों ने इंद्रेश्वर मंदिर बनवाया था, जिसके नाम पर बस्ती का नाम इंद्रपुर, फिर इंदूर व इंडोर और अंत में इंदौर पड़ा।

भगवान इंद्र ने इस मंदिर में की थी पूजा

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इंदौर के नाम के पीछे एक पौराणिक कथा भी प्रचिलत है। कहते हैं देवताओं के राजा इंद्र को शरीर में सफेद दाग की बीमारी ने घेर लिया। दूसरे देवताओं ने उन्हें बीमारी से निजात पाने के लिए महादेव की उपासना करने की सलाह दी। तब देवराज इंद्र ने इसी मंदिर में आकर कडी तपस्या की और वे ठीक हो गए। इंद्र द्वारा इस मंदिर में तपस्या करने की वजह से इस शिवालय का नाम इंद्रेश्वर महादेव नाम प्रचिलत हो गया। शिवपुराण में इंद्र द्वारा तपस्या किए जाने का उल्लेख है। अब इंदौर के नाम के पीछे बताई जाने वाली वजह जो भी हो, मगर हर वजह में इंद्रेश्वर मंदिर का जिक्र अवश्य है। इंदौर के नाम का कारण बने इस मंदिर का ऐतिहासिक और धार्मिक दोनों दृष्टियों से काफी महत्व है।

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