sulemani chai: उज्जैन की आवाम को सुलेमानी सलाम…

उज्जैन की आवाम को सुलेमानी सलाम…
उज्जैन की शाही जामा मस्जिद के मामले में पंजाब के शाही इमाम की बात गौर करने लायक है—अच्छे काम की तारीफ हो और भटके हुए रहनुमाओं को रास्ता दिखाया जाए। उज्जैन में मस्जिदों और हक की लड़ाई में समाज ने सब्र भी दिखाया और हिम्मत भी। लेकिन सब्र का मतलब यह नहीं कि अवाम हमेशा सब्र करे और रहनुमा हमेशा बयान।
असल रहनुमाई तो तब है जब अपने खेमे की गलतियों पर भी उंगली उठे, समाज को टकराव नहीं बल्कि जोडऩे की बात हो ,साथ ही हर बात का एहतेजाज को संविधान और लोकतंत्र के साथ किया जाए । दूसरे मजहब के किसी भाई को तकलीफ भी न हो ,अपने जज्बातो पर काबू भी हो और अपने बड़ों के फैसलों पर इत्मीनान के साथ इत्तेहाद भी।
पूरे मामले में जिस तरह उज्जैन की आवाम ने पूरे प्रदेश को झुलसने से बचाया। अलग अलग फिरको में बंटने की बजाय एक कलमे के तले हिम्मत ,सब्र,ओर इत्तेहाद का मुजाहिरा किया। उस पर उज्जैन के एक एक फर्द को इस बार का सुलेमानी सलाम। साथ ही प्रदेश प्रशासन से एक सवाल जब इसी रस्ते में सती गेट ओर दूसरी ऐतिहासिक धरोहरों को बचाया जा रहा हे, तो 350 साल से ज्यादा पुरानी इस नायाब मस्जिद के लिए भी कोई रास्ता निकला जा सकता था या नहीं ?

मुंबई के तार, इंदौर से करंट..!
मुंबई की फिल्मी गलियों में कभी जिस नाम के करंट की चर्चा खूब रही, अब उन्हीं समीर वानखेडे साहब के तारों में इंदौर से भी करंट आता-जाता दिखाई दे रहा है। कहते हैं, मुंबई में साहब की कार्रवाई का असर बड़े-बड़े फिल्मी नामों तक पहुंचा था। अब इंदौर की गलियों में भी साहब के तारों का नेटवर्क चर्चा में है। मामला फिल्मी हो या कारोबारी, नाम बड़ा हो तो इंदौर का तार बीच में जुड़ता नजर आता है।
चाय के ठिये पर सुलेमानी सवाल बस इतना है—ये तार आखिर किसके लिए बिछे हैं और करंट किसे देना है? क्योंकि राहत किसे मिलेगी, किस पर कार्रवाई होगी और किस फाइल में अचानक ठंडक पड़ जाएगी… इसका हिसाब-किताब शायद इंदौर वाले साहब की डायरी में ही लिखा है। अब साहब इसमें कितना सच ओर कितना फर्जीवाड़ा है, ये तो समीर वानखेडे ही जाने।
बाकी जनता तो यही समझे कि तार मुंबई के हैं, करंट इंदौर का है और मीटर किसके नाम पर चल रहा है—ये राज अभी सुलेमानी चाय की प्याली में ही उबल रहा है।

ओवैसी के कबीले में गद्दारो की मौज…

साहब पिछले दिनों हमारे मिल्लत के ठेकेदार असुद्दीन ओवेसी की पार्टी में इंदौर के शहर मुखिया की नियुक्ति खलील मुल्तानी के रूप में हुई ,जो कि मोहतरम वही है जो बांक पंचायत से एआई एमआई की इज्जत को 100, वोट भी न दिला पाए फिर कांग्रेस सरकार आई तो साहब बेढंगे मेंढक की तरह कांग्रेस की गोदी में फुदकी मार एआईएमआई को बीजेपी की बी टीम कह कर कोसते नजर आए।
इतना ही नहीं साहब एक जमीन घोटाले में जेल की हवा तक खा चुके हैं। अब सवाल ये हे कि मोहसिन साहब की आँखो पर खलील ने कौन से कलर की पट्टी बांधी कि उन्हें पूरे इंदौर से सबसे काबिल ये मुल्तानी मिट्टी ही नजर आई।

दुमछल्ला…
काजी नम्बर वन में आने लगा दम…
हमारे इंदौर के काजी नम्बर वन में धीरे धीरे दम आने लगा है, जो कि काबिले तारीफ है, तो साहब हुआ यूं कि पिछले दिनों काफिला मोहब्बत का, के बैनर तले कार्यक्रम ,,पैगम्बर का पैगाम,,में शहर के हर मजहब और तबके को जोडऩे का काम किया, वही अम्मार साहब ने मंच पर पूरी कांग्रेस को भी जमा कर डाला, जिसे लेकर काजी साहब ने मंच से जहां एक तरफ काम की तारीफ की वही मंच पर कांग्रेसी महफिल पर सवाल भी उठाया ,इसी के साथ उज्जैन के मसले पर भी काजी साहब ने बेबाकी से अपनी बात कर प्रशासन से सवाल करने की हिम्मत भी की, जो कि जि़होश रहनुमा की पहचान है।

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