Sulemani Chai: एजाज के बदले शेरानी…छोटी पार्टी में बड़ी गुटबाजी…

एजाज के बदले शेरानी…
तो साहब, आखिरकार मोर्चे के प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा हो ही गई। वरना हमें तो खटका था कि कहीं यहां भी डॉ. साहब वाली रवायत न दोहरा दी जाए और नियम-कायदों को किनारे रखकर खान साहब को फिर पांच साल के लिए एजाज से नवाज दिया जाए। खैर, इस बार ऐसा नहीं हुआ। वैसे भी सवाल ये था कि साहब अगले किसी एजाज के काबिल बचे भी थे या नहीं?वैसे शेरानी का आयुष्मान कार्ड डॉ साहब की डिस्पेंसरी से ही पास हुआ है। इसी के साथ अब मोर्चे में एजाज की जगह दहाड़ सुनाई देगी। मगर इंदौर के आर.के. बैनर से खुन्नस का असर शायद कुछ ज्यादा ही गहरा था। तभी प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में सबसे काबिल समझे जा रहे हमारे नसीर शाह साहब की कुर्सी के नीचे ही किसी ने हाथ ताप लिए और बाजी रतलाम ले उड़ा। उधर शहर से प्रदेश इकाई में शिक्षा, खेल और व्यापारी प्रकोष्ठ के तीन-तीन अध्यक्ष बनाकर इंदौर की झोली भर दी गई। मगर मोर्चे की बारी आई तो शहर के कई ख्वाबों पर पानी फेरकर रतलाम के इब्राहिम साहब को शेर बना दिया गया। अब शहर वालों का सवाल बस इतना है—जब तीन प्रकोष्ठों में इंदौर इतना काबिल था, तो मोर्चे की बारी में अचानक रतलाम की मिट्टी इतनी उपजाऊ कैसे हो गई…?
छोटी पार्टी में बड़ी गुटबाजी…
अवेसी साहब ने भोपाल में कदम क्या रखा, कांग्रेस के किलों में खलबली और बीजेपी के सियासी वेंटिलेटर को जैसे ऑक्सीजन सिलेंडर मिल गया। प्रदेश की सियासत में एआईएमआईएम खुद कुछ करे न करे, कांग्रेस को कई सीटों पर नुकसान पहुंचान और प्रदेश में पार्टी बीजेपी की मोहसिन बनती जरूर नजर आ रही है, इसका हिसाब किताब अलग-अलग खेमों में अलग-अलग लगाया जा रहा है। लेकिन असली तमाशा तो अपनी छोटी सी पार्टी के बड़े-बड़े गुटों में दिखाई दे रहा है। भोपाल में आवेसी की सभा ओर इंदौर में यूसीसी के खिलाफ यात्रा में पार्टी के ही कुछ जिम्मेदार चेहरे नदारद नजर आए। कोर कमेटी के असलम खान हों या शहर के जिम्मेदार शहजाद शेख, दोनों की गैरमौजूदगी पर कार्यकर्ताओं में कानाफूसी खूब हुई। वजह बताई गई कि टीवी में सिग्नल नहीं आया, इसलिए कार्यक्रम में भी सिग्नल नहीं मिला! अब साहब, पार्टी छोटी हो तो कोई गम नहीं, मगर गुट बड़े हों तो मुश्किल जरूर होती है। एक तरफ अवेसी साहब प्रदेश में पार्टी का नेटवर्क बढ़ाने में लगे हैं और दूसरी तरफ नीचे वाले नेटवर्क में ही ‘कनेक्शन प्रॉब्लम’ चल रही है। भोपाल और इंदौर दोनों जगह कुछ चेहरे नजर नहीं आए तो सवाल यही उठ रहा है—साहब, पार्टी में सिग्नल कमजोर है या आपसी नेटवक…?
बाबा का एक वोट बड़ा…
खजराने में सरकारी स्कूल के उद्घाटन पर पहुंचे विधायक महेंद्र हार्डिया के दिल का दर्द आखिर लबों पर आ ही गया। इशारा उन सैकड़ों भाजपाई कार्यकर्ताओं की तरफ था, जो मौके पर तो मौजूद रहते हैं, मगर अपने ही घर के वोट बाबा के नाम पर जुटाने में शायद थोड़े बेबस नजर आते हैं। बाबा का सवाल भी असल में उन्हीं अपनों से था, मगर सियासत में इल्जाम की गेंद अक्सर दूसरे पाले में फेंकना आसान होता है। सो, दामन बचाने की कवायद में कुछ भाजपाई दूसरों पर उंगली उठाते नजर आए।
अब जनाब, जो बरसों से खजराने में बाबा और भाजपा के नाम की मलाई-मक्खन खाते आ रहे हैं, बाबा की आवाज भी तो पहले उन्हीं तक पहुंचनी चाहिए थी। खैर, हमें क्या… इस पूरे किस्से में कांग्रेस के वार्ड अध्यक्ष बबलू खान ने जरूर बाबा को अपने एक वोट का वादा कर दिया। यानी सियासत के इस मेले में कम से कम एक वोट तो पक्का निकला… बाकी वोटों की तलाश जारी है!
दुश्मनों से मेरा कोई ख़ौफ़ नहीं,
डर तो अपनों की ख़ामोशी से लगता है।
दुमछल्ला: मुन्ना… सरकार का उजला कुर्ता…
वार्ड क्रमांक 60 में पार्षद और पूर्व पार्षदों पर चल रही मुश्किलों के बीच अब राहतों का दौर भी शुरू हो गया है। इसी सिलसिले में पूर्व से भी पूर्व पार्षद मुन्ना अंसारी के कुर्ते पर कलफ कायम रहने की खबर ने वार्ड के कई भावी पार्षदों के सुनहरे ख्वाबों में खलबली मचा दी है। हाईकोर्ट से मिली राहत को समर्थक जहां इंसाफ की जीत बता रहे हैं, वहीं सियासी गलियों में सवाल यह भी तैर रहा है कि आखिर यह राहत किसके लिए कितनी भारी पड़ेगी। उधर, अंसारी को मिले इंसाफ की चर्चा के बीच हाल ही में पकड़े गए अवैध ऑटो पाट्र्स के तहखाने के बाहर लगे ‘सुनहरा इंसाफ’ के बोर्ड ने कहानी में एक नया पेंच डाल दिया है। अब देखना दिलचस्प होगा कि वार्ड 60 की सियासी चौसर पर अगली चाल किसकी होती है और मुस्लिम बहुल वार्डों में अगला नंबर किसका आता है।
फिलहाल तो मुन्ना भाई का कुर्ता कलफदार है… और बाकी दावेदारों की नजर कुर्ते से ज्यादा कुर्सी पर।
मेहबूब कुरैशी ९९७७८६२२९९