देश का पहला वाटर प्लस शहर होने के दावे को लेकर उठने लगे हैं सवाल

कान्ह-सरस्वती नदी में मिल रही गंदगी, पानी हो रहा दूषित

इंदौर (आशीष साकल्ले)
महानगर में प्रवाहित होने वाली कान्ह एवं सरस्वती नदी में मिलने वाले गंदे पानी के ोतों को बंद करने के लिए नगर निगम ने लाखों-करोड़ों रुपए खर्च कर न केवल नाला टेपिंग का काम कराया था, बल्कि सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट बनवाने के साथ ही इंदौर को देश का पहला वाटर प्लस शहर होने का दावा भी किया था। बावजूद इसके, नगर निगम के इस दावे को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं।
दरअसल, चार-पांच दशक पहले तक शहर के मध्य क्षेत्र से प्रवाहित होने वाली कान्ह एवं सरस्वती नदियां स्वच्छ-निर्मल एवं शीतल जल से कलकल करती थी। समय के साथ-साथ यह अपना अस्तित्व खोते गई और नाले में तब्दील होने लगी। दौनों ही नदियों के अस्तित्व को बचाने की अनुकरणीय पहल करते हुए निगम प्रशासन ने संकल्प प्रोजेक्ट शुरू किया । इसके लिए दोनों ही नदियों में सफाई अभियान चलाया गया, सैकड़ों-हजारों डम्पर गाद निकलवाई गई। नदी किनारे की झुग्गी बस्तियां एवं अतिक्रमण हटाए। लोग नदी में गंदगी न फैंके इसके लिए नदियों के दौनों ओर के तट पर सघन पौधरोपण भी किया गया और इसके बेहतर परिणाम भी दिखाई देने लगे हैं।
पहल अच्छी थी, लेकिन सही तरीके से नहीं हुआ क्रियान्वयन
देखा जाए तो कान्ह-सरस्वती नदी के अस्तित्व को जिंदा रखने एवं संरक्षण प्रदान करने की दृष्टि से नगर निगम ने अच्छी पहल की, लेकिन उसका उचित क्रियान्वयन नहीं हुआ। इस कारण लक्ष्य अभी भी दूर है। दोनों ही नदियों में भी कूड़ा कचरा, सीवरेज का पानी मिल रहा है, गाद की समस्या अभी भी बरकरार है। जलकुंभी की समस्या का भी समाधान नजर नहीं आ रहा है।

वाटर प्लस शहर का दावा कितनी हकीकत-कितना फसाना?
स्वच्छता में पंच लगाने के बाद से इंदौर नगर निगम के नवाचार देश दुनिया में चर्चा का विषय रहते है। नि:संदेह यह गौरव की बात है, लेकिन देश का पहला वाटर प्लस शहर होने का दावा करना जल्दबाजी है। अभी शुरुआत हुई और कान्ह सरस्वती जब तक शुद्ध निर्मल शीतल जल से लबालब झील नजर नहीं आती, ऐसे दावे करना बैमानी। हद तो यह है कि स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में चल रहे विभिन्न निर्माण एवं विकास कार्यों के चलते निगम ने इस संकल्प प्रकल्प को ही भुला दिया। यह सत्य है कि नदियों का सौंदर्यीकरण हुआ है, लेकिन अभी शुद्धिकरण नहीं हुआ। इसलिए वाटर प्लस शहर का दावा आधी हकीकत है तो आधा फसाला। देखना यह है कि आगे आगे होता है क्या?
नाला टेपिंग में गड़बड़ी से लगा संकल्प प्रकल्प को ग्रहण
देखा जाए तो नगर निगम के संकल्प प्रकल्प को नाला टेपिंग में हुई गड़बड़ी का ग्रहण लग गया। इसका खुलासा तब हुआ, जब बारिश के दौरान पानी निकासी की उचित व्यवस्था किए बिना नाला टेपिंग से कई कॉलोनियां जल जमाव का शिकार हुई, कई बस्तियां टापू बन गई। लोगों के घरों में पानी घुस गया, गृहस्थी का समाना तैरने लगा और महानगर की सड़कें तालाबों में तब्दील हो गई। इसके चलते खूब किरकिरी हुई और निगमकर्मियों को शहर में जल जमाव की समस्या से निपटन के लिए टेप किए गए नालों के मुहाने फिर खोलने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके बाद से ही कई जगह कान्ह सरस्वती में गंदा पानी मिल रहा है और गाद बढ़ते जा रही है। इससे नदियों का पानी दूषित होने के साथ ही दुर्गन्ध भी फैल रही है।

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