आस्था-अंधविश्वास या धतकरम: धतूरे के साथ लाल कपड़े की भी जमकर हुई मांग

मामला पं. मिश्रा द्वारा दिये गये मार्गदर्शन का

इंदौर। अब इसे आस्था कहा जाए या अंधविश्वास? कुछ लोग इसे धतकरम भी कह रहे हैं। बावजूद इसके धर्मांध श्रद्धालु इन दिनों धतूरे के साथ लाल कपड़े की जमकर खरीददारी कर रहे हैं। इतना ही नहीं पूजा अनुष्ठान कर इसे अपने आवास के साथ ही प्रतिष्ठानों में भी स्थापित कर रहे हैं ताकि सुख शांति और समृद्धि के साथ ही उनकी तमाम मनोकामनाएँ पूर्ण हो सके।
दरअसल मामला कुछ यूं है कि विगत दिवस सिहोर में शिवपुराण कथा एवं रुद्राक्ष महोत्सव के आयोजन में उमड़ी भारी भीड़ के कारण चर्चाओं में आये पं. प्रदीप मिश्रा द्वारा शनिवार को अपने प्रवचन में श्रद्धालुओं को यह मार्गदर्शन दिया गया कि ४ मार्च को न केवल शिव पार्वती बल्कि राधाकृष्ण का भी मिलन हुआ था। इसी के चलते इस दिन यदि भगवान भोले भंडारी पर धतूरे के फल को हल्दी में भिगोकर अर्पित किया जाए एवं मनोकामनाएँ की जाए तो वह अवश्य ही पूर्ण होगी। पं. मिश्रा द्वारा आनलाइन प्रवचन में दिये गये इस ज्ञान को आत्मसात करने में देशभर के श्रद्धालु जुट गये। इंदौर में तो यह हालत थी कि छोटे बड़े तमाम शिवालयों में अल सुबह से श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी। लोग आस्था एवं श्रद्धा के साथ कोड़ियों के दाम बिकने वाले धतूरे के फल को २१ रुपए से लेकर १५१ तक खरीदने में भी पीछे नहीं हटे। दोपहर तक यह हालात हो गई थी कि शहर में धतूरे के फल ढूंढे से भी नहीं मिल रहे थे।

क्या है धतूरा अर्पित करने की प्रक्रिया
पं. मिश्रा के मुताबिक जो भी श्रद्धालु धतूरे के फल को हल्दी के घोल में लपेटकर शिवलिंग पर अर्पित करेगा और अपनी मनोकामनाएँ भगवान भोलेनाथ को बतायेगा वह अवश्य ही पूर्ण होगी। हालांकि उन्होंने इसकी कोई समयावधि नहीं बताई है, लेकिन कहने वाले कह रहे हैं कि लगातार सात शुक्रवार को यदि भोलेनाथ को इसे अर्पित कर पुन: अपने घर लाकर लाल कपड़े में बांधकर रखने से सभी मनोकामनाएँ पूर्ण हो सकती हैं। धंधेबाजों ने तो इसे अच्छा अवसर माना और जहां तहां से धतूरे के फल लाकर शिवालयों के सामने बेचना शुरु कर दिया है। साथ ही धतूरे के फूल आंकड़े, बिल्व पत्र और फूलमालाओं का धंधा भी चल पड़ा। अब सच क्या है यह तो ईश्वर ही जानता है, लेकिन इतना तय है कि श्रद्धालुओं ने पूर्ण आस्था के साथ पं. मिश्रा के मार्गदर्शन को आत्मसात कर लिया और धंधेबाजों की दुकानदारी चल निकली।

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