देश की 78 प्रतिशत आबादी पिछड़ा वर्ग

सवर्णों और ऊंची जातियों की संख्या मात्र 20 प्रतिशत

नई दिल्ली (ब्यूरो)। एक ओर केन्द्र सरकार जातियों की अलग-अलग गणना करवाने के लिए तैयार नहीं है, उच्चतम न्यायालय में भी शपथ पत्र दिया जा चुका है कि जाति गनगणना से देश में अस्थिरता पैदा होगी। दूसरी ओर भारत सरकार के ही सांखिकी विभाग ने 7 राज्यों में जाति जनगणना का आंकड़ा बड़े ही चुपचाप तरीके से जारी कर दिया। यह आंकड़ा हिन्दी में न जारी करते हुए पंजाबी, तमिल और अंग्रेजी में 10 लाइनों में जारी किया गया है। छुपाने के तमाम प्रयास के बाद भी आंकड़े बता रहे हैं कि ग्रामीण क्षेत्र की 80 प्रतिशत आबादी पिछड़ा, दलित और हरिजन है। सबको जोड़ दें तो 78 प्रतिशत आबादी पिछड़ा वर्ग की और 21 प्रतिशत आबादी में सवर्ण शामिल हैं।
केन्द्र सरकार के मंत्रालय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम मंत्रालय ने 7 राज्यों में अध्ययन किया। इस अध्ययन में ग्रामीण परिवारों में किसानों की जाति, उनकी जोत और आर्थिक स्थिति का आंकलन किया गया। इसमें यह भी सर्वे किया गया कि किस जाति के किसान की क्या सामाजिक, आर्थिक स्थिति है। इस माह यह रिपोर्ट केन्द्र सरकार को मिल गई थी। इस रिपोर्ट को केन्द्र सरकार ने बड़ी जादूगरी से प्रेस सूचना कार्यालय के माध्यम से बड़े ही तरीके से 10 लाइन में 10 सितंबर को जारी किया। एनएसओ रिपोर्ट 527 को हिन्दी में जारी नहीं किया, क्योंकि जातिय जनगणना को लेकर सबसे ज्यादा हल्ला उत्तरी राज्यों में ही चल रहा है। जातिय जनगणना को लेकर ही बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और तेजस्वी को एक जाजम पर ला दिया है। सांखिकी मंत्रालय ने सात राज्यों में यह जनगणना की है। इसमें उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक शामिल हैं। इन्हीं राज्यों में पिछड़ा वर्ग को लेकर सबसे ज्यादा राजनीति हो रही है।
जिन सात राज्यों में यह जनगणना की गई है उनमें 235 लोकसभा सीटें आती है। यह सर्वे वर्ष 2019 में दो हिस्सों में किया गया था। जनवरी से अगस्त और सितंबर से दिसंबर। पहले दौर में 58 हजार 35 परिवार और दूसरे दौर में 56 हजार 894 परिवारों को शामिल किया गया। कुल 1 लाख 14 हजार 923 परिवार इस सर्वे में शामिल हुए। ग्रामीण भारत का यह सबसे बड़ा सर्वे है और इसमें जो आंकड़े सामने आए हैं वो बता रहे हैं देश की 78.3 प्रतिशत आबादी पिछड़ों की है, जबकि ऊंची जातियों की आबादी 21.7 प्रतिशत है।

आरक्षण भीख नहीं
देश की 80 प्रतिशत आबादी को 27 प्रतिशत आरक्षण भी लेने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, जबकि 20 प्रतिशत आबादी के लिए 50 प्रतिशत सीटें सामान्य है। पिछड़ा वर्ग को मिल रहा आरक्षण कोई अहसान या भीख नहीं है। देश की आबादी का बड़ा हिस्सा इन्हीं जाति का है।
ऊंची जातियों को रिझाने में गिर रहे हैं राजनैतिक दल
जिस ब्राह्मण जाति को प्रभावित करने के लिए कहीं मंत्री बनाया जा रहा है तो कहीं जनेऊ पहने जा रहे हैं, जबकि देश की कुल आबादी में ब्राह्मणों का प्रतिशत 4 भी नहीं है। जिस देश में पिछड़े संघर्ष कर रहे हैं वहां राजनैतिक दल ऊंची जातियों को लुभाने में मर रहे हैं।
प्रधानमंत्री ने पल्ला झाड़ा
बिहार के मुख्यमंत्री के साथ कई नेताओं ने प्रधानमंत्री से जातीय जनगणना की मांग की थी। इस मामले में उच्चतम न्यायालय में भी याचिका दायर है। जहां पर भारत सरकार की ओर से जवाब दिया गया है कि जातीय जनगणना से देश मेें अस्थिरता पैदा होगी।

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