
इन्दौर। नगर निगम में आर्थिक हालात नहीं सुधर पा रहे हैं। महापौर पुष्यमित्र भार्गव के कार्यकाल के साढ़े 3 साल हो गये हैं मगर पूरा शहर अभी भी खुदा पड़ा है और लोग परेशान हैं वहीं निर्माण कार्य भी ठप हैं। ठेकेदारों का बकाया फिर बढ़ गया है। करीब 700 करोड़ रूपये ठेकेदारों को देना है मगर पैसों की तंगी के कारण निगम यह भुगतान नहंी कर पा रहा है।
बड़े ठेकेदारों ने अब निगम के कामों से दूरी बना ली है और जो भूमिपूजन डेढ़ से दो साल पहले हुए थे उनमें कई जगह निर्माण ही शुरू नहीं हो सके। मार्च महीने में भुगतान के और बिल लगेंगे जिससे बकाया बढ़ जाएगा।वर्ष 2022 में निगम चुनाव के बाद जहां शुरूआत मेें भी ठेकेदारों पर सैकड़ों करोड़ बकाया था वहीं साढ़े 3 साल बाद भी यही स्थिति है जबकि इस दौरान मुख्यमंत्री से लेकर लोकसभा स्पीकर तक इन्दौर नगर निगम आ चुके हैं। मुख्यमंत्री ने निगम को आर्थिक मदद देने की घोषणा भी सभागृह में की थी मगर वह पैसा आज तक नहंी आया। शहर का हर वार्ड खुदा पड़ा है और लोग सुबह से शाम तक परेशान होते रहते हैं मगर अधिकारियों से लेकर पार्षदों तक किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। ठेकेदारों ने निगम से दूरी बनाा ली है और पहले जहां 25 बड़े ठेकेदार काम करते थे उसमें से अब 8 से 10 ठेकेदार ही बचे हैं। वहीं जो भूमिपूजन दो साल पहले हुए थे उनमें कई जगह निर्माण काम भी शुरू नहीं हो सके, जबकि टेंडर छपवाने से लेकर भूमिपूजन कार्यक्रम में भी पैसा खर्च हुआ। 5 से 7 बार तक टेंडर लगाए गये।
टेेंट, तंबू, नाश्ते, खाने पर अधिक खर्च
महापौर भार्गव इन दिनों फिर जनता चौपाल लगा रहे हैं और टेंट, तंबू, टेबल, कुर्सी के अलावा चाय, नाश्ता पर भी खर्च हो रहा है। इसी तरह भूमिपूजन कार्यक्रम या लोकार्पण कार्यक्रम में भी लाखों रूपये खर्च हो जाते हैं। बड़े कार्यक्रम में भी बड़ी राशि खर्च होती है मगर निगम की आय वृद्धि के लिए कुछ नहंी किया जा रहा है। परिषद कार्यालय से सभी कार्यक्रम तय किये जाते हैं और यहीं बिल लगाकर ठेेकेदारों का भुगतान करवाया जाता है। जनता चौपाल में लोग समस्या बता रहे हैं मगर निराकरण नहीं हो रहा है। अधिकारी फील्ड में नहीं जाते हैं न ही कार्यालय में बैठते हैं। सिर्फ महापौर, आयुक्त के दौरे के समय ही अधिकारी दिखते हैं।
राजस्व वसूली में पिछड़े
संपत्तिकर, जलकर और कचरा शुल्क वसूली में निगम पिछले वित्तीय वर्ष की अपेक्षा इस साल पिछड़ गया है। संपत्तिकर में जरूर कुछ आगे हैं मगर जलकर, कचरा शुल्क वसूली में निगम पीछे चल रहा है। राजस्व विभाग का अमला कॉलोनियेां, बस्तियों में पानी का टैक्स नहंी वसूल पाता है न ही कचरा शुल्क लिया जाता है। कई जगह लोग संपत्तिकर भी नहीं भर रहे हैं। अवैध कॉलोनियों में वसूली के लिए कर्मचारी अधिकारी कम ही जाते हैं। जलकर व कचरा शुल्क में करोड़ों रूपये पिछले साल से पीछे हैं। भवन अनुज्ञा व कॉलोनी सेल के पैसों से निगम का कुल राजस्व बढ़ा है।