जब अटलजी मेरी कविता पर बिफरे, बुलाकर डांटा और नसीहत दी

satyanarayan sattan
satyanarayan sattan

इंदौर (सुधीर शुक्ला)। शहर के सबसे चर्चित, बेबाक, चिंतक, विचारक, खरी-खरी कहने के आदि और सरस्वती पुत्र कहे जाने वाले राष्ट्रीय कवि सत्यनारायण शर्मा जिन्हें शहर और प्रदेश ही नहीं, पूरे देश में सत्तन के नाम से जाना पहचाना जाता है, वे सात फरवरी को 86 बसंत पूरे करके 87वें वर्ष में प्रवेश करने जा रहे हैं। उनके चेले चपाटियों में कोई उन्हें गुरु कहता है तो घर के आसपास वे दादा, तो कहीं काका के नाम से पुकारे जाते हैं। इन मुकाम तक पहुंचने को वे मां भगवती का आशीर्वाद बताते हैं। उनको सरस्वती पुत्र और राष्ट्रीय कवि कहने पर जवाब होता है कि लोगों क ा प्यार, रामजी की कृपा और माता-पिता और पूर्वजों का आशीर्वाद है।

मल्हारगंज से लगे तंबोली बाखल में यदि आप किसी से भी सत्यनारायण शर्मा के बारे में पूछेंगे तो शायद ही कोई जवाब दे सके, लेकिन यदि इस नाम के आगे आपने सत्तन शब्द जोड़ दिया तो इलाके के रहवासी ही नहीं सडक़ चलते लोग भी आपको न सिर्फ उनके घर का पता बता देंगे, बल्कि उनके घर ले जाकर गुरु, दादा या काका का संबोधन देकर आवाज भी लगाएंगे और उनके आने पर चरण स्पर्श करके बताएंगे कि यह आपका पता पूछ रहे थे तो मैं लेकर आ गया। यह हकीकत है राष्ट्रीय कवि पेशे से शिक्षक और मां भगवती के उपासक सरस्वती पुत्र कहे जाने वाले भाजपा नेता सत्यनारायण सत्तन की लोकप्रियता की। सिर्फ शहर के पश्चिमी क्षेत्र में ही नहीं समूचे इंदौर प्रदेश ही नहीं समूचे देश में उन्होंने जो ख्याति अर्जित की है, उसकी मिसाल ही नहीं है। 86 वर्ष पूरे करके 87 वर्ष में प्रवेश करने की पूर्व संध्या पर उनसे दैनिक दोपहर ने खास बातचीत की। इसके प्रमुख अंश प्रस्तुत हैं।

कुश्ती मल्य, शस्त्र विद्या और कविता विरासत में मिली
उन्होंने बताया कि वह पिता छोटेलाल शर्मा (छुट्टन उस्ताद) के साथ अखाड़े में जाते थे, वहीं उन्होंने कुश्ती, मल्य और शस्त्र विद्या सीखी हैष पिता से ही मुझे काव्य पाठ विरासत में मिला है।
जनसंघ की पर्चियां बांटकर शुरुआत की
उन्होंने बताया कि 13 साल की उम्र से जनसंघ से जुड़ा और मल्हारगंज वार्ड से पार्षद का चुनाव लड़ रहे पंडित रामनारायण शास्त्री के चुनाव की पर्ची बांटकर राजनीतिक यात्रा शुरु की। तब जनसंघ का जनाधार नहीं था और लोग हम पर हंसते थे। चुनाव में हमारी जमानत जप्त होती थी। मैं संघ का स्वयंसेवक बना। 1980 में जनसंघ का नाम बदलकर भारतीय जनता पार्टी किया गया और मैं विधानसभा क्षेत्र क्रमांक 1 से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और अपने ही शिष्य चंदू व्यास से हार गया। उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में मैंने पंडित कृपाशंकर शुक्ला को पराजित किया और विधायक बना।

अटलजी की नसीहत ही मेरी पूंजी
उन्होंने अटलजी से जुड़े कई किससे भी बताए और कहा की उनके साथ काव्य पाठ करने का भी मौका मिला है, लेकिन मेरठ के कवि सम्मेलन में हुई एक घटना का जिक्र करते हुए वे भावुक हो गए। मथुरा में एक अभिनंदन समारोह के बाद हुए कवि सम्मेलन में मैंने राष्ट्रपति वेंकटरमन तथा उपराष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा पर एक कविता पढ़ी। इसी दौरान मैंने एक टिप्पणी भी की जो अटल जी को नागवार लगी तो काव्य पाठ के बाद अटलजी ने मुझे मंच के पीछे बुलाकर डांट पिलाई। वे बोले मैं विपक्ष का नेता हूं और तुम विधायक, इतना तो समझो कि संविधान, राष्ट्रपति और तिरंगे पर कभी भी टिप्पणी नहीं की जा सकती ऐसी हिम्मत कैसे हो गई? जब उनके पांव छूकर माफी मांगी तो कुछ क्षण बाद वह बोले, अब तो गलती हो ही गई है, लेकिन इसे कभी दोहराना मत। उन्होंने बताया कि अटलजी कई बार उनके साथ रात को टोरी कार्नर पर चाय पीने और पान खाने आते थे।

मैथिलीशरण की चार लाइनों में सत्तन का काव्य पाठ
कवि और किश्चियन कॉलेज में हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ पंकज अग्रवाल ने सत्तन जी की संपूर्ण साहित्य साधना को हिंदी कविता का एक स्वर्णिम दौर बताया है। उनकी इस काव्य यात्रा को उन्होंने डॉक्टर मैथिली शरण गुप्त की इन चार पंक्तियों में समाहित करने का प्रयास किया है।
राम तुम्हारा चरित्र स्वयं ही काव्य है
कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है।
(सौजन्य से डा. पंकज वीरमाल)

 

शर्मा से ‘सत्तन’ बनने का सफर
उन्होंने बताया कि मां उन्हें प्यार से सत्यनारायण के बजाय सत्तन पुकारती थी। कविता पाठ के दौरान जब पत्रकार नगेंद्र आजाद के संपर्क में आया तो उन्होंने मुझे सत्यनारायण शर्मा के स्थान पर सत्यनारायण के साथ सत्तन उपनाम रखने का सुझाव दिया। इस तरह मैं शर्मा से सत्तन कहा जाने लगा।

सरकारी नौकरी छोड़ी
उन्होंने बताया कि मैं सरकारी स्कूल में शिक्षक बन गया था, लेकिन 1965 में ट्रांसफर होने पर मां ने भेजने से इनकार कर दिया तो नौकरी ही छोडऩा पड़ी। फिर वैष्णव स्कूल में 14 साल अध्यापन कराया और 1980 में भाजपा ने मुझे जब प्रत्याशी घोषित किया तो वह नौकरी भी छोडक़र मैं पूरी तरह से राजनीति में आ गया।

अटलजी भी आए तो गुरु ने मिलवाने से गुरेज नहीं किया
तंबोली बाखल जहां दिग्गज नेताओं के निवास के लिए जाना जाता था। वहीं टोरी कॉर्नर नामचीन दिग्गजों नेता बुद्धिजीवी समाजसेवी व्यापारी और पत्रकारों के रात में होने वाले जमघट के लिए पहचाना जाता था। पुलिस प्रशासन के अफसर की भी वहां आमद होने लगी तो रौनक के साथ दबदबा भी बढ़ता गया। सामाजिक आयोजनों के साथ कवि सम्मेलन, राजनीतिक सभाएं, राम दरबार, मुशायरा भी होने लगे और समां बंधने लगा। अटलजी, जार्ज फर्नांडिस, राममनोहर लोहिया समेत कई बड़े नेताओं ने यहां आकर इसका नाम और चमका दिया। माणक चंद बाजपेयी, राहुल बारपुते, बालाराव इंगले, बाबूलाल गिरी, छोटेलाल गिरी, गोपीकृष्ण गुप्ता, रामचंद्र नीमा, प्रेम खंडेलवाल और तत्कालीन एसपी सुरजीत सिंह के साथ सत्तनजी रात की बैठक के किरदार होते थे। डोल ग्यारस पर निकलने वाले डोल में शामिल अखाड़े में गुरु भी पटा घुमते और तलवार से सडक़ पर रखे गए नींबू को काटकर शस्त्र कला का कौशल दिखते थे जिसे देखने के लिए टोरी कॉर्नर के अलावा गोराकुंड, सराफा और राजवाड़ा में खासतौर से लोग आते थे। गुरु को शस्त्र कला भी पिता से कविता की तरह विरासत में मिली थी। उनके पिता छोटेलाल शर्मा छुट्टन उस्ताद भी शस्त्र कला और काव्य पाठ के फन में माहिर थे।

हाजिर जवाबी में सत्तनजी लाजवाब


सत्यनारायण सत्तन का काव्य पाठ हो या भाषण अथवा फिर कोई कथा, जब वह बोलना शुरू करते हैं तो ऐसा लगता है बस सुनते ही चले जाओ। उनके शब्दों का चयन चौंका देता है। हाजिर जवाबी में उनका कोई सानी नहीं है, वे लाजवाब हैं। खरा बोलना उनकी शैली रही है, इससे उनको देशभर में ख्याति मिली है। राजनीति में हमारी भले ही हमारी उनसे मत भिन्नता रही है, लेकिन मन भिन्नता कभी भी नहीं रही है। उनकी टीका का हम बुरा नहीं मानते हैं। यह कहना है पूर्व लोकसभा अध्यक्ष, पद्म भूषण और आठ बार की इंदौर से सांसद रहीं सुमित्रा महाजन का। उन्होंने कहा कि शिक्षक और कवि समाज के पथ प्रदर्शन होते हैं और इत्तेफाक से सत्तन जी दोनों ही हैं।
टोरी कॉर्नर के कवि सम्मेलनों में उनका जादू देखा
उन्होंने कहा कि मैंने उनको टोरी कॉर्नर पर काव्य पाठ और मंच संचालन करते देखा है। गजब की क्षमता है उनमें। मैं महाजन साहब के साथ उनको सुनने गई थी। वहां पर दूर-दूर तक सिर्फ लोग ही लोग थे और ठहाके के साथ उनके काव्य पाठ पर तालियां बजा रहे थे। साथ ही मंच पर विराजमान स्व. गोपाल दास नीरज, माया गोविंद समेत कवियों की जमात भी उनकी रचनाओं पर दाद दे रही थी।
एक टिप्पणी पर मिलने गई तो तारीफ की
पार्टी में किसी मुद्दे पर हमारी उनसे मत भिन्नता रही तो यह कहने में मुझे कोई गुरेज नहीं है, लेकिन उनसे कभी भी निजी रूप से मनमुटाव या मनो मालिन्य नहीं रहा है। संगठन पर उनकी गहरी पकड़ रही है। उन्होंने पार्टी की और नेताओं की गलतियों को सुधार है। ध्यान आकर्षित कराया है। हम जब भी गोकुल दादा के घर तंबोली बाखल जाते थे तो उनसे भी मिलते थे। उनकी मेरे खिलाफ की गई किसी भी टिप्पणी का मैंने कभी भी बुरा नहीं माना है। वे शतायु हों और समाज का मार्गदर्शन करते रहें ।
ही मेरी कामना है।

उपचुनाव के जनसंपर्क में गले मिले
सत्तन जी के बाबूजी और हमारे बप्पा की दोस्ती बचपन में अखाड़े जाने के समय से है। सत्तन जी मेरे अग्रज इसलिए भी हैं कि वह मेरे बड़े भाई के दोस्त रहे हैं। जब मैं कक्षा आठवीं में था, तब अखाड़े में हमने साथ में कसरत की है और जोर भी किए हैं। राजनीति में भी मैं और सत्तन जी एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़े हैं। विधायक चंदू व्यास के निधन के बाद हुए उपचुनाव में उन्होंने मुझे भले ही हरा दिया हो, लेकिन फर्क नहीं पड़ा है। शिक्षक होने से उनको बोलने में महारत हासिल है। खरी-खरी बोलने के कारण उनको भी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा है, लेकिन उन्होंने आदत नहीं बदली, जिसका अभी भी पूरा इंदौर कायल है। इंदौर शहर कांग्रेस और इंदौर विकास प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष पंडित कृपाशंकर शुक्ला ने सत्तन के परिवार से अपने संबंधों पर कहा कि यह स्थाई है।

चुनाव लड़े… लेकिन कटुता नहीं आई

उन्होंने कहा कि चुनावी हार-जीत को हमने सहजता से लिया। अभी भी हम राजनीतिक विरोधी हैं। उपचुनाव में जनसंपर्क के दौरान जब हमारा आमना-सामना हुआ तो समर्थकों की नारेबाजी के बीच हम गले मिले और हालचाल पूछकर अपने-अपने प्रचार में लग गए थे। चुनाव परिणाम के बाद उन्होंने मुझे पराजय पर दिलासा दिया और मैंने उन्हें जीत की बधाई दी थी।
अहिल्या की नगरी का नाम रोशन किया
सत्तन जी ने काव्य पाठ से पूरे देश में अहिल्या की नगरी का नाम रोशन किया है। अटलजी के बाद आज भी लोग उनकी कविताओं तथा भाषणों के दीवाने हैं। कवि सम्मेलनों में अपनी पार्टी की नीतियों के खिलाफ काव्य पाठ करने का साहस सत्तनजी ही कर सकते हैं। अटलजी से प्रभावित होने के बावजूद सत्तनजी ने अपनी ही पार्टी में खरी-खरी बोलने में कोई भी कसर नहीं छोड़ी है।

…और गोकुल दादा को लूना गिफ्ट करवा दी
काका 1983 में उपचुनाव जीतकर विधायक बने, लेकिन एक परेशानी भी आ गई। उत्सव चंद पोरवाल ने हिसाब दिया। चुनाव के लिए हुए चंदे में से 3 हजार बच गए थे उसका क्या करें? राशि पार्टी फंड में देने की बात भी आई तो काका ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया और कहा कि गोकुल दादा साइकिल पर पार्टी के लिए शहर में घूमते हैं इसलिए और पैसे इक_ा करके उनको लूना भेंट कर देते हैं। बात गोकुल दादा तक पहुंची तो वह बिफर गए और बोले, मैं चंदे के पैसे से लूना नहीं लूंगा? दादा बमुश्किल से माने तब मल्हारगंज स्थित माधौपुरिया धर्मशाला में जाग्रत जनता मंच (जाजम)के कार्यक्रम आयोजित करके राजेंद्र धारकर, नारायणराव धर्म, पोरवाल जी, पंडित श्रीवल्लभ शर्मा और काका ने दादा को लूना भेंट की। (नारायण भूतड़ा ने बताया)
मेरा सहमति पत्र तो गोकुल दादा की जेब में है
काका संबंध निभाने में बेजोड़ हैं। भाजपा कार्यालय में हुई एक घटना अभी भी मेरे जेहन में अंकित है। मामला गोकुल दादा को भाजपा का नगर अध्यक्ष बनने से जुड़ा हुआ है। अध्यक्ष पद को लेकर कशमकश थी। तत्कालीन अध्यक्ष भंवरसिंह शेखावत फिर से दावेदारी कर रहे थे और उनके सामने जब काका ने मैदान संभाला तो पार्टी में बखेड़े से बचने के लिए पार्टी काका और शेखावत दोनों को ही रोकना चाहती थी। गोकुल दादा के नाम पर जब सर्वानुमति एक नेता ने कटाक्ष किया कि पहले सत्तनजी से तो सहमति ले लो।तभी सत्तनजी बोले, चिंता मत करो, मेरी सहमति का पत्र गोकुल दादा की जेब में रखा है। ( डा. जितेंद्र सांखला ने बताया)

 

You might also like
Leave A Reply

Your email address will not be published.