मुर्गा बांग नहीं देगा तो क्या सवेरा नहीं होगा…

क हावत है मुर्गा बांग नहीं देगा तो क्या सवेरा नहीं होगा। कल पूर्व सेनाध्यक्ष एमएस नरवणे की किताब के जिस अंश को लेकर लोकसभा में भारी हंगामा मचा और लोकसभा प्रतिपक्ष नेता राहुल गांधी को इस किताब के एक मेग्जीन में छपे कुछ अंशों को पढऩे नहीं दिया गया। भारी हंगामे की भेंट सदन चढ़ गया था। पर इससे क्या इस किताब के अंश देश में लोगों को नहीं मालूम पड़े। यह किताब पिछले दो साल से सरकार के पास प्रकाशन की अनुमति के लिए पड़ी हुई है। इस किताब में 31 अगस्त 2020 की दरमियानी उस रात के चंद घंटों का जिक्र है, जब चीन की बड़ी सेना भारत की बॉर्डर पर टैंक के साथ पहुंच चुकी थी। इस दौरान सेनाध्यक्ष नरवणे इस मामले में क्या करना है इस पर राजनीतिक फैसला परंपरा के अनुसार चाहते थे। परन्तु प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संदेश में कहा गया जो उचित समझे वो करें। यह किसी भी सेनाध्यक्ष के लिए सबसे कठिन समय था। जब उन्हें देश के लिए फैसला करना था। हालांकि राहुल गांधी के उद्बोधन न हो पाने के बाद देशभर में करोड़ों लोगों ने गूगल के सर्च इंजन पर जाकर वाल्यूम में इस किताब की जानकारी निकाली, वहीं कारवांन पत्रिका के अंश भी जमकर तलाशे गए। खोज से संबंधित बिन्दु में जनरल नरवणे के चार दशक के कैरियर को देखा गया और 2020 के लद्दाख गतिरोध पर विशेष ध्यान दिया गया। राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर राजनीतिक बहस उच्च सदन में न हो पाने के कारण युवाओं की जिज्ञासा इस मामले में भरपूर रही। हालांकि खोज करने वाले लोगों की सटिक संख्या की जानकारी अभी सामने नहीं आई है। पर 2026 की शुरुआत में भारत में एक हाई प्रोफाइल वायरल खोज विषय बन गया है। सोशल मीडिया के जमाने में आज देश की बड़ी आबादी चंद मिनट में ही ऐसे विषयों को पूरी तरह खंगाल देती है। ऐसे में सरकार के लिए भी यह किसी किरकिरी से कम नहीं है। दूसरी ओर सदन में भले ही इस पर बहस तकनीकी कारणों से नहीं हो पाई हो पर अब यह पूरे देशभर में चर्चा का विषय बन गई है। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि 1962 में चीन के खिलाफ तात्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ही फैसला लिया था तो वहीं 1965 में विपरीत परिस्थिति में भी लालबहादुर शास्त्री ने चीन के खिलाफ निर्णय लिया, वहीं 1971 में इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध का ऐलान करते हुए जनरल सैम मानेकशा को तैयारियों को निर्देश दिए थे। वहीं कारगिल के दौरान अटलजी का फैसला ही रहा। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाक पर बादलों के नीचे से हमले करने का निर्णय भी प्रधानमंत्री मोदी ने लिया था। फिर इस बार चुप्पी का क्या कारण है यह देश को मालूम पडऩा चाहिए।